Tuesday, 28 February 2012

मेरा मन


मेरा मन 
अपने अंदर उठती हुई 
धवल,निर्वस्त्र ,निर्विकार 
लहरों को तुम्हारे सामने ले आया .
और 
तुम्हारी आज्ञा से 
वो इनमें डूब गया .....
अचानक न जाने क्यों 
तुमने कहा कि 
वो इनको पीकर 
घड़े में भरकर 
ठन्डे अंधियारे में रखकर 
अपने से अलग हो जाने दे ...
क्षमा करना 
तुम्हारे बदलाव पर
 उसका अस्तित्व नहीं है 
मेरा मन है वो
 कोई गिरगिट नहीं है 
मेरा मन है वो 
कोई गिरगिट नहीं है .. .......

मेरा मन



मेरा मन 
अपने अंदर उठती हुई 
धवल,निर्वस्त्र ,निर्विकार 
लहरों को तुम्हारे सामने ले आया .
और 
तुम्हारी आज्ञा से 
वो इनमें डूब गया .....
अचानक न जाने क्यों 
तुमने कहा कि 
वो इनको पीकर 
घड़े में भरकर 
ठन्डे अंधियारे में रखकर 
अपने से अलग हो जाने दे ...
क्षमा करना 
तुम्हारे बदलाव पर
 उसका अस्तित्व नहीं है 
मेरा मन है वो
 कोई गिरगिट नहीं है 
मेरा मन है वो 
कोई गिरगिट नहीं है .. .......

Tuesday, 21 February 2012



नेह से किरणों को तुमने जब छुआ 
आग पिघली और पनीली हो गयी 
अधमुंदी आँखों से देखे स्वप्न जो 
भोर की यादें सुनहली हो गयी 
ये जहाँ अनजान था बेबाकियों से 
तोहमतें उनकी पहेली हो गयीं 
खोल कर बंधों को बिखरी ज़ुल्फ़ यूँ 
खुशबुएँ सारी नशीली हो गयीं 
गुम हुए थे राग पिछली बार ,अब 
आस की तानें सुरीली हो गयीं 
खो गयीं अनुभूतियाँ वीराने में 
चाह कर तुमको नवेली हो गयीं 
ले लिए वापस सभी शिकवे गिले 
क्या बचा मैं फिर अकेली हो गयी .......

Wednesday, 15 February 2012

मैं नफरत करती हूँ तुमसे



मैं नफरत करती हूँ तुमसे 
उस हद तक 
जितना आज तक किसी ने तुम्हें 
प्रेम भी नहीं किया होगा ...
तुम्हारी उन तमाम शिकायतों से 
जो हमेशा बे सिरपैर रही हैं 
और जरुरत से ज्यादा 
तारीफ के बोझ से कंपकपाते 
शब्दों से भी मुझे उलझन होती है ....
तुम्हारे उलहाने हर बार 
मौसम के रंग की तरह बदलते हैं 
तुम्हारे तानों की धूप कभी कभी 
मुझे भी झुलसाती है 
मेरी ग़ज़लें ही नहीं बदली सिर्फ 
तुम्हारी कविताओं की गहराई भी 
कम हुई है ...
तुम्हारी महक की बारिशों में भीगने की 
सिहरन तो अभी तक ताज़ा है 
न जाने कतरों के कहर ने 
तुम्हे क्यों नहीं भिगोया है ....
तुमसे मुलाकात का सवाल 
हर साँस के साथ जवाब में बदलना चाहता है 
फिर भी तुम उसकी मियाद 
ख़त्म होने की फ़िक्र करते हो ....
मैं जानती हूँ कि यह प्रेम का मौसम है 
फिर भी मैं तुमसे नफरत करती हूँ 
इस डर के साथ -
कि इतनी ही शिद्दत से इस मौसम में 
कहीं प्रेम न हो जाये तुमसे ---------!

Monday, 6 February 2012

मौन



कभी कभी मैं तुम्हारे मौन को सुनना चाहती हूँ 
और तुम बोल पड़ते हो .....
क्या ज़रूरी है कि हर एक सोच के आवेग को शब्द पहनाएं ?
उतार कर टांगे हुए 
अर्थ के आवरण बहुत शोर मचाते हैं
चीखती सी आवाज़ों में --
फिर इस शोर के भार से 
उपजते हैं पत्थर ,
कभी ह्रदय पर ,तो कभी जुबान पर 
धीरे धीरे एक दीवार उग आती है --
मैं चाहती हूँ सन्नाटों की आवाज़ सुनना
जो बार बार लौट जाती है
इस ऊंची -दुरूह दीवार से टकरा कर
बिना एक भी दरार बनाये .
जब भी तुम्हारे और मेरे बीच की दीवार
रास्ता बन जाएगी
मैं फ़िक्र करना छोड़ दूंगी ............