मैं नफरत करती हूँ तुमसे उस हद तक
जितना आज तक किसी ने तुम्हें
प्रेम भी नहीं किया होगा ...
तुम्हारी उन तमाम शिकायतों से
जो हमेशा बे सिरपैर रही हैं
और जरुरत से ज्यादा
तारीफ के बोझ से कंपकपाते
शब्दों से भी मुझे उलझन होती है ....
तुम्हारे उलहाने हर बार
मौसम के रंग की तरह बदलते हैं
तुम्हारे तानों की धूप कभी कभी
मुझे भी झुलसाती है
मेरी ग़ज़लें ही नहीं बदली सिर्फ
तुम्हारी कविताओं की गहराई भी
कम हुई है ...
तुम्हारी महक की बारिशों में भीगने की
सिहरन तो अभी तक ताज़ा है
न जाने कतरों के कहर ने
तुम्हे क्यों नहीं भिगोया है ....
तुमसे मुलाकात का सवाल
हर साँस के साथ जवाब में बदलना चाहता है
फिर भी तुम उसकी मियाद
ख़त्म होने की फ़िक्र करते हो ....
मैं जानती हूँ कि यह प्रेम का मौसम है
फिर भी मैं तुमसे नफरत करती हूँ
इस डर के साथ -
कि इतनी ही शिद्दत से इस मौसम में
कहीं प्रेम न हो जाये तुमसे ---------!