मेरा मन
अपने अंदर उठती हुई
धवल,निर्वस्त्र ,निर्विकार
लहरों को तुम्हारे सामने ले आया .
और
तुम्हारी आज्ञा से
वो इनमें डूब गया .....
अचानक न जाने क्यों
तुमने कहा कि
वो इनको पीकर
घड़े में भरकर
ठन्डे अंधियारे में रखकर
अपने से अलग हो जाने दे ...
क्षमा करना
तुम्हारे बदलाव पर
उसका अस्तित्व नहीं है
मेरा मन है वो
कोई गिरगिट नहीं है
मेरा मन है वो
कोई गिरगिट नहीं है .. .......

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