कभी कभी मैं तुम्हारे मौन को सुनना चाहती हूँ
और तुम बोल पड़ते हो .....
क्या ज़रूरी है कि हर एक सोच के आवेग को शब्द पहनाएं ?
उतार कर टांगे हुए
अर्थ के आवरण बहुत शोर मचाते हैं
चीखती सी आवाज़ों में --
फिर इस शोर के भार से
उपजते हैं पत्थर ,
कभी ह्रदय पर ,तो कभी जुबान पर
धीरे धीरे एक दीवार उग आती है --
मैं चाहती हूँ सन्नाटों की आवाज़ सुनना
जो बार बार लौट जाती है
इस ऊंची -दुरूह दीवार से टकरा कर
बिना एक भी दरार बनाये .
जब भी तुम्हारे और मेरे बीच की दीवार
रास्ता बन जाएगी
मैं फ़िक्र करना छोड़ दूंगी ............

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