नेह से किरणों को तुमने जब छुआ
आग पिघली और पनीली हो गयी
अधमुंदी आँखों से देखे स्वप्न जो
भोर की यादें सुनहली हो गयी
ये जहाँ अनजान था बेबाकियों से
तोहमतें उनकी पहेली हो गयीं
खोल कर बंधों को बिखरी ज़ुल्फ़ यूँ
खुशबुएँ सारी नशीली हो गयीं
गुम हुए थे राग पिछली बार ,अब
आस की तानें सुरीली हो गयीं
खो गयीं अनुभूतियाँ वीराने में
चाह कर तुमको नवेली हो गयीं
ले लिए वापस सभी शिकवे गिले
क्या बचा मैं फिर अकेली हो गयी .......

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