Sunday, 29 December 2013

अब मेरा दर्द तुम्हारा नहीं रहा .....
मुझे लगता था दर्द का रिश्ता प्रेम के बंधन से ज्यादा मज़बूत होता है .....???
अभी अभी धुली ,गुनगुनी धूप सी
तुम्हारी हँसी
आकर पसरी है मेरे आंगन में -
रहेगी एक कोने भर में
शाम तक .....
सुखा लेने दो मुझे कुछ नम कतरे ,
सीले हुए ख्वाब ,
भीगे फाहे से भारी पलकों की चिलमन
और उँगलियों के गीले पोर !
वक़्त कम है बहुत 
सड़क के पार पेड़ों की टहनियां
ज़रा सा आसमान भेजती हैं रोज़
बाकी कर देती हैं
हवाओं , पंछियों के नाम .
सूनी गली के छोर पर भी
अटक जाती है एक टुकड़ा धूप
खींचतान सी करती झुरमुट से ....
कल रात से चांदनी भी
बरसना भूल गई है
सिमटी पड़ी है धूल से अटे बादलों के पीछे .
अब मंद हो चली तुम्हारी हंसी की गर्माहट
फिर से धुली ,गुनगुनी होने में
सूरज के ताप से ज्यादा
मेरी तड़प के ताप से सेंक लूँ तुम्हारी हँसी .......।
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सुनो,
मुस्कराहट के बादल बिखेरो अब ....
सूरज कब से निर्जला बैठा है ????
मेरी नींदें तुम्हारे दर्द के गलियारे में 
अक्सर चक्कर लगा कर लौट आती हैं ...
बस यूँ ही बन गए हैं 
छत के कोने कोने पे अधूरे कंगूरे से ...
इन दिनों बारिशें मुझे नहीं भिगोतीं हैं 
वो झीनी सी मासूमियत काफी हुई एक पैरहन के लिए .....!!
प्रेम में संदेह से उपजी कड़वाहट को 
नींद की गैर मौजूदगी में बहे आंसुओं में 
उबाल कर देखो 
तुम्हें लगेगा कि प्रेम का आसवन 
हो ही नहीं सकता .....
या फिर ये कडवाहट 
दरअसल यादों के खुरदरे आंगन की 
गीली मिटटी में दबी निम्बोलियों की थी 
जिसे वक़्त रहते बुहारने से पहले ही 
आशंकाओं का तूफ़ान 
तमाम दरख्तों की जड़ें हिला गया था ....!
झील में नमक सी तुम्हारी आवाज़
अक्सर यादों की लहरों पे बहती
अतीत के किनारों से टकराती है
और सन्नाटे संगीत में बदल जाते हैं .....
इस बार मिलो तो
अपनी आवाज़ की पोटली 
मुझे दे जाना ...
कुछ गहरी नज़रें ,मासूम शरारतें
और बातों का पिटारा भी ...!
मुझे बूँद दो बूँद नहीं
बौछारें चाहिए तुम्हारी मुस्कराहटों की
ताकि उदासी के मौसम
अब पलट कर भी ना देखें मुझे ....!!!
आज फिर से उगी वही तमन्ना
एक बूँद बनूँ और बरसूँ तुम्हारे शहर में ...
मिन्नतें करुँगी सूरज से
इतना जलाये मुझे कि मैं बादल बन जाऊं ,
हवा से करुँगी गुज़ारिश
कि सीधे ला पटके मुझे 
तुम्हारे शहर के आसमान में
और बस -
मैं बरस पडूँ वहां ......
कोई फ़िक्र नहीं
जो किसी नदी नाले में भटकती फिरूँ
हो सकता है पेड़ की फुनगी पे ही अटक जाऊं
या फिर नुक्कड़ वाले नल से ही टपक पडूँ ....
चाहत ये नहीं कि तुम्हारे शहर की मिटटी में
यूँ ही गुम हो जाना है मुझे ...!
ख्वाहिश तो यह जताने की है मेरी
कि मैं तुम्हें कभी नहीं भूल सकती......!!!
समंदर के खुश्क होने के इंतजार में 
मेरी तमाम दुआओं का सैलाब 
पलकों पर ही थमा है ....
एक आहट होते ही तुम्हारे करीब आने की 
मोंती से बिखर जायेंगे किनारों पे .....!!!
जब भी तुम्हारी आवाज़ का सहारा लेकर 
ख्वाबों को पर दिए हैं मैंने 
कहीं कुछ टूट कर ,
बार बार जुड़ा है ...
त्वचा के छिद्रों से लगातार रिसते दर्द 
हवा की नमी में घुल मिल गए 
और प्रेम का आकार 
सावन के बादलों सा बढ़ता गया ....
कुछ घुटन भरी सांसें 
ताज़ा दम होकर 
छितरा गयी यहाँ वहाँ
और बनता गया धुंध का एक कारवाँ
तुम्हारे शहर तक ......!
यकीन मानो ,
प्रीत का सुलगना ,सिर्फ तपाता नहीं
ना ही घोलता है रोज़ कानों में
मीठे शब्दों का शहद ---
ना ही प्रेम एक खरोंच भर है
जो खीँच देता है लकीर
किसी की गर्दन के पीछे से
पीठ के आखिरी छोर तक .....
ये दर्द ,घुटन ,तपन और खरोंच--
मेरे शहर से तुम्हारे शहर तक
शामिल होने वाले
हर ख्वाब का
ताउम्र पीछा करते रहेंगे
और तमाम रास्ते मुड़ मुड़ कर
तुम्हारी आवाज़ के हुनर पे
हैरान होते रहेंगे ....!!!
उस एक सुबह को साथ लिए
झील अब भी वहीं ठहरी हुई है
तमाम बारिशें थक गई-
पानी बाहर उफनता ही नहीं ...
कुछ मुस्कराहटें लहरों के साथ
जब तब करवटें बदलतीं हैं 
और-
न जाने क्यूँ नींद के झोंके बार बार
मंदिर की घण्टियों से सकपका जाते हैं ...
उम्मीद के घरोंदे
रोज़ बना के उजाड़ देती हूँ ,
गुलाबी रंग अक्सर नीला हो जाया करता है
और माथे के चाँद सितारे
अब सुदूर आसमान के आँगन में टंग गए हैं ...
ज़रूरी नहीं कि इतिहास पत्थरों पर ही लिखे जाएँ
जलते हुये दियों की दास्तां
हथेलियों की कालिख से भी सुनी जा सकती है ।
फूलों को कांटे समझे जाने का वक़्त
अब आ ही चुका है
फिर भी ---
आसमान के साथ साथ
सप्तमेष ग्रह के तमाम मंत्र
42000 बार दोहरा लिए हैं
जबकि जानती हूँ
कि प्रेम का इश्तहार नहीं होता ......!!!
लगातार तेज़ बारिश ....मन फिर भी गुनगुना सा ....
आज नहीं तो कल... 
बूंदों का एक होना ,सैलाब तो लाएगा ही ...
चाहे झीलों में या आँखों में .....!!!
कभी कभी सब कुछ खत्म नहीं होता ...चाहो तो भी नहीं 
वो बचा हुआ यूं ही कहीं 
बिखरा सा ,सिमटा सा 
अचानक मेरे पास से तुम्हारे पास 
और तुम्हारे पास से मेरे पास 
आने जाने में ही 
बढ़ता चला जाता है .....लगातार....
और किस्से घटने की बजाय 
बेतहाशा दौड दौड़ के बनने सवरने लगते हैं 
फिर से .....!!!
सख्त होते होते
पत्थर से चट्टान हो जाना
अब तक इतना आसान लगता था
आज जाना कि खारे पानी से
दरारें पड़ जाती हैं उसमें ...

सख्त ,कठोर ,संगदिल कहने भर से
चट्टानें नहीं तड़कतीं
ना ही वो खिसक कर उलझतीं हैं
पगडंडियों में -
जब कभी मौका मिले तो
दो डग चढ़ कर उन पर, पूछना
कि क्यूँ नहीं मौसम के रंग बदलते उनके लिए ?
क्यूँ बरिशे भीतर तक भिगोती नहीं उन्हें ?
और क्यूँ उन्हें कंकरों की तरह
झील में उछाले जाने की हसरत नहीं होती ?

कभी ये भी होगा कि
फूल बरसेंगे उस चौराहे पर
जहां से हम -तुम
अपनी अपनी राहें मुड गए थे
बगैर एक दूसरे की तरफ देखे
क्यूंकि-
जब गले तक उग आती है नागफनी
तब एक आह की गुजारिश भी
तमाम रास्ते भुला देती है
मुझसे तुम तक पहुँचने के .......!!!
  1. क्यूँ सुने वह
    तुम्हारी हर उस गैर ज़रूरी बात को
    जिसकी आहट भर से
    कंपकपा उठती हैं उसकी उँगलियाँ
    बगैर कलम को ये बताए
    कि बाकी शब्दों का इंतज़ार 
    उसे उम्र भर करना होगा ?

    क्यूँ थामे रखेगी वह जीवन भर
    आसमान को अपने हाथों में
    जबकि तुम रोज़ बादलों की पैदावार को
    बिना उसे बताए
    न जाने किसकी उम्मीदों के खलिहान में
    छोड़ आते हो ?

    क्यूँ खुली रखे वह अपनी आँखें इस डर से
    कि तमाम अजन्मे स्वप्न
    इस बार भी उसकी पनीली कोरों की
    गहराई में समा कर
    अपनी पैदाइश की घड़ी को
    क़यामत तक पहुंचा कर ही दम लेंगे ?

    क्यूँ जवाब दे वह उन बेहिसाब सवालों का
    जिनके उग जाने भर से
    नागफनी के जंगलों की चुभन
    अपना सारा असर छोडकर
    हरसिंगार के सिरहाने
    निहत्थी बैठ जाती है ?

    सुनो -
    अब सिर्फ सुनेगी नही ---
    न ही वह हमेशा की तरह अपना हाल ही बताती रहेगी -
    अब वह महसूस करेगी
    उस मौलिक ,अप्रकाशित कविता को
    जिसके यूं ही लिख देने से ज्यादा ज़रूरी
    उसमें से तुम्हारी मौजूदगी का अहसास
    निकाल फेंकना है
    और यकीन मानो
    जिस दिन ऐसा कुछ हो गया
    तो उसका जीना नहीं -
    उसका मरना
    तमाम कोशिशों के बावजूद
    तुम्हारे चेहरे की मुस्कराहट
    कई जन्मों तक मिटा नहीं पाएगा ॰...!!!
बिखरा था कल सब कुछ यहाँ वहाँ ,आज समेटने की कोशिश की ....
तो आँख भर आयी ....याद है तुमने कहा था ...
जो समेटा मेरे वजूद को,
तो रेत की सिलवटों में... कतरा भर जगह न बचेगी ....
तुम्हारी आँखों की नमी को !!
सुनो नदियो
सारे सपने, हँसी,आँसू ,
प्रेम ,बेवफ़ाई और दर्द की तहरीरें
गिन गिन के बीन लो
और बहा लो अपने साथ -
फिर भी 
तुम्हारे बहते जाने की दिशा
समंदर की ओर ही रहेगी .....
अब खतम करो अपना ये भरत मिलाप
और चल पड़ो मिटाने अपना अस्तित्व
क्यूकि
गुम हुये रिश्तों को ही शिद्दत से
तलाशते हैं लोग
और समंदर में तुम्हारा घुल जाना ही
नई सोच के साथ देगा
तुम्हारे पुराने सपनों को
बादलों सा पुनर्जन्म ......!!!!
 —

Saturday, 28 December 2013

हर रोज़ सुबह ओस सी टपकती है तुम्हारी याद
सूरज के चढ़ते ही धुंध हो जाती
फिर रात के नम होने का इंतज़ार करती। …
सुनो ,
ओस का गिरना सिर्फ फूलों की मुस्कराहट ही नहीं उगाता
मुझे भी सूरज को देर तक सोये रहने का
वास्ता देना पड़ता है। …… 
यूँ इस तरह से अचानक
बिना मुड़ के देखे तुम्हारा जाना। … 
हम हथेलियों से अब तक
पगडंडियों को नापे चले जा रहे हैं। … 
एक उम्र गुज़ारी बगैर तुम्हारे
अब कुछ लम्हे खड़े हैं इंतज़ार में …
गुज़रो इधर से
तो नज़र भर देख लेना। 
हथेलियों के वाष्प बन जाने  तक
थामे रहना मुझे यूँ ही
जानती हूँ
धूप  से हो तुम। 

Monday, 27 May 2013

दहलीज के दायरे



छत के कोने से गुजरते पिछली रात
उस जगह पाँव पड़ गया मेरा
जहाँ खड़े हो कर
दहलीज के दायरे समझाए थे तुमने -
ना कभी दहलीज पार की,
ना दायरे से बाहर ही निकली मैं
फिर भला कैसे ऊँचाइयों में बसने का ख्वाब देखती ?
जानती हूँ ख्वाहिशों की तासीर
अक्सर नम होती है
और मंजिलों की रौशनी
भूमध्य रेखा के पार झिलमिलाती है
फिर भी तमाम उलाहनों की आंच
आँखों में उतारती  रही
क्या हुआ जो निगाहें झुलस कर धुँधला गई ?
प्रतिशोध की ज्वाला तो दूर
मुझ में तो सामान्य ताप भी
नहीं उभरा अब तक !
रही सही कसर
स्मृतियों के शीतल झोंके पूरी कर देते हैं
जिन्हें बियाबान रेगिस्तान के तपते कोने में
गज भर नीचे गाढ़ के मैं
निश्चिन्त हो गई थी .......
काश कि उन्हें गंगा किनारे तैरा दिया होता
अब तक समंदर में जा गिरे होते
इस तरह बार बार वापस तो न आते !!
या फिर ऐसा ही मैंने अपनी देह के साथ किया होता .....
.तो तुम्हारी मुस्कराहटें मेरी आत्मा
के चारो ओर बिखर कर
अब तक---
 कहकहों  में तब्दील हो गयी होती .....!

Thursday, 23 May 2013

स्वनिर्णय



एक एक शब्द से 
सौ नश्तरों की चुभन और 
तेजाब सी जलन का अहसास पाना 
हर स्त्री के नसीब में नहीं होता ---
देह के भीतर भी पत्थरों की कमी नहीं 
और बाहर  भी . 
हर चोट एक दूसरे से 
गुत्थम गुत्था हो कर शून्य हो जाती है 
ओर  क्या रह जाता है ....?
समर्पण की धज्जियाँ उडाता अट्टाहस  ......!
यह नियति नहीं -
कर्मरेखा या भाग्यफल भी नहीं ,
स्वनिर्णय होता है 
जो बार बार सिर्फ इस वज़ह से 
कमज़ोर पड़ता है कि 
अगली बार ऐसा नहीं होगा शायद ........! 
जंगलों में पेड़ अकेले नहीं होते 
परन्तु हर लता उनसे आकर लिपटती भी नहीं .
मैं गुलीवर के देश को नहीं जानती 
लेकिन घूरों पर उगते कुकुरमुत्ते 
अक्सर जंगलों में तब्दील नहीं होते 
और----
 उन बौने  जंगलों में
 तेजाब  से जले चेहरे वाली स्त्री 
अब नहीं उगती ......!!!

Thursday, 16 May 2013

पिछले दो बरस


पिछले दो बरसों में 
कितनी ही बारिशें हुयीं 
तमाम झीलें लबालब  भरीं 
लाल -पीले फूलों से वादियाँ महकीं 
पर -मैं न भीगी …
एक बार भी 
न मन भीगा न तन ....!
यूँ सब कुछ वैसा ही है 
हरा -भरा ,नम सा -
मिटटी पे एक गीला हाथ फिरा दिया हो जैसे 
कहीं कुछ सूख कर तड़का नहीं अब तक !
मुमकिन है
अगले दो बरस या उससे ज्यादा भी
ऐसा ही रहे ....
भीतर तक झाँकने की
जुर्रत नहीं की मैंने ....
क्या पता कहीं कोई सूखा ,पपडीदार
ज़ख्म रिस रहा हो
कुरेदे जाने के इंतजार में
नासूर बन जाने तक
खामोश ---
अलहदा ---!!!

बस…यूँ ही तो


यादों की तलहटी से परावर्तित होकर 
अब मेरी आवाज़ अक्सर 
मुझ तक ही वापस पहुँच जाती है ....
शायद तुम्हें पीछे मुड़ कर देखने की 
आदत नहीं रही 
और मैं .....
कभी तुमसे आगे निकल न पाई !

तुम अब भी 
मुलाकातों के मुलम्मे चढ़ी यादों में 
बसर करते हो
जबकि मेरे लिए
तमाम उम्र का इंतजार भी काफी नहीं
बस…यूँ ही तो
कविताओं की बस्तियां उजडती हैं ---

रिश्तों का सौंधा कच्चापन छोड़ कर
तुम्हें तब्दीलियों का पथरीलापन
रास आने लगा है -
फिर भी मुझ में बस रहे 'तुम' को मैंने
तल्खियों की धूप से बचा रखा है .....
तुम जानते हो ना
पाँवों के निशान हमेशा
पगडंडियों पर ही उभरते है
कोलतार की सड़कों पर नहीं ??

Wednesday, 1 May 2013

फिसलन भरे ये शब्द....


कुछ दिनों से 
शब्द घेरे हैं मुझे चारों और से 
कोलाहल सा मचाते ...!
.न तो उड़कर परे हटते हैं 
न ही रचते कोई प्रेम कविता ..
तमाम कोशिशें करने पर भी
बिगड़ जाती है बार बार
शब्दों की तासीर
और कडवाहट टपकने लगती है
अनकहे बयानों से ....
.झील के किनारे चिपटे
भूरे हरे शैवालों सी
फिसलन भरे ये शब्द
लड़खड़ाते हुए वही आवाज़ देते हैं
जो पर्वत पार के मंदिर के घंटों में
अब भी गूंजती है .....!!!

Friday, 19 April 2013

अब कविता मेरे अंतस की गहराई से नहीं निकलती


अब कविता मेरे अंतस की गहराई से नहीं निकलती 
ना ही वह पहुँच पाती है किसी दूसरे के मर्म तक ....
कविता का यूँ बेमकसद होना 
उस सड़क पर बेतहाशा दौड़ने जैसा है 
जिसकी मंजिल की तलाश 
तुम पर ख़त्म नहीं होती !
कविता अब हलकी फुलकी भी न रही 
जो पंख लगा कर पहुँचती रही तुम तक 
कागज़ पर उतरने से  पहले ...
शब्द दर शब्द आग बनती जाती है 
या फिर उभरती है
 एक बर्फीली नदी की शक्ल में ....
जानते हो,
 जब कविता रोती है 
तो तमाम ख्वाहिशें सूख जाती हैं 
और समन्दर पानी उधार मांगने लगता है 
उस एक  पल को जीने की वज़ह बना लेना 
बहुत मुश्किल होता है 
जब बर्फ पिघल कर झीलों में बहा करती थी ....
गुजरे हुए कल की तमाम कड़वाहटें 
बिखरा दी हैं मैंने हवाओं में ....
शायद अब तो मौजूद  हूँ मैं 
 तुम्हारी रगों के लहू में ???

Monday, 25 March 2013

फूल यूँ ही आग नहीं उगलते

फूल यूँ ही आग नहीं उगलते 
ज़रूर चांदनी से इलज़ाम बरसे होंगे रात भर ....
धुआं धुआं प्रीत ने 
तमाम गिरहें खोल ,
बिछा दी है शब्दों की चादर 
जिद है तो तहा कर रख दो -
कविता फिर उम्र भर न बिखरेगी ...!
यकीन मानो -
जब सिलसिले शुरू होते हैं 
तो सहूलियतें किनारा कर लेती हैं 
अक्सर दो चार काँटों से
बाड बनाने की कोशिशें
नाकामयाब होती हैं
यूँ न हो कि कुछ देर सुस्ताने भर से
मंजिलों का नामोनिशान ओझल हो जाये ...
वक़्त का तकाजा है
कविता को उगना है
फूलों को महकना है
चाँद बार बार अश्क ना बरसाये
पत्थरों की अफवाहों पे धूल पड़ जाये
तमाम खुशबुएँ सिलसिलेवार बिखर जाएँ .....
तब भी फूल आगउगलना न छोड़ें
तो -
हथेलियों के कटोरे बना
मेरी आँखों के पानी से
मुस्कराहट छिड़क देना .वहाँ ..........!!

Wednesday, 13 March 2013

चलो एक बार....


चलो एक बार फिर वहीँ लौट जाएँ 
जहाँ से रोज़ एक मुस्कराहट को 
दफ़न करने के सिलसिले शुरू हुए थे 
यूँ न हो कि तमाम उदासियाँ 
एक अधूरी नज़्म के ख्याल भर से 
खिल उठें .....
चलो लौट जाएँ उस अनकही कहानी की गोद में 
जिसके तमाम शब्द
 तितर बितर होने से पहले 
मेरे आँचल  में मुंह छिपा कर 
उसके अंत की आहट पर हँसे थे ....
या फिर गुम  हो जाएँ उसी अजनबी मोड़ पे 
जिसके दोनों तरफ लगे, राह बतलाते तीर 
तुमने अपनी ओर घुमा के कहा था 
कि मेरी हर राह सिर्फ तुम तक पहुँचती है ...
लौटना चाहो तो वो मंदिर भी वहीँ है 
जहाँ बरसते पानी की इबारत 
अब भी बिना पढ़े 
समझ ली जाती है ....
ये सब न हो सके तो 
मेरी कविता के आखिरी शब्दों में भी 
लौट सकते हो 
जिनका अर्थ सिर्फ तुम्हारी मौजूदगी में ही 
अपना सा लगता है ......

Friday, 1 March 2013

इतिहास


ये सच है कि 
इतिहास बनाने से पहले 
पूरी शिद्दत से आज को जीना पड़ता है 
फिर भी आधे अधूरे ख्वाब समेटने में 
वक़्त तो लगता है ...
मैं नहीं जानती कुछ भी 
तय करना ,
शायद मुश्किल ही होता होगा 
उतना ही -
जितना काले सफ़ेद अक्षरों का 
किसी रंगीन तस्वीर में तब्दील होना .
क्यारी में खिलते गुलाब और
गमले में उगे कैक्टस का फर्क भी
मुझे तुमने बताया था
अब ये सवाल ना करना कि
अक्सर मेरी कविताओं में झील
और तुम्हारी में रेत क्यूँ हुआ करती है !
तमाम शब्दों का बारूद में बदल जाना
अचानक नहीं होता
विश्वास के परखच्चे उड़कर
तुम्हारे आंगन में भी बिखरेंगे
तब बादलों से कुछ देर और बरसने की
गुज़ारिश न करना ....
बारिशों से तुम्हें यूँ भी नफरत है !
अगली कविता के जन्म से पहले
सारे मौसम धुंधला जायेंगे
तुम चाहो तो अभी से अपनी
यादों की पोटली संभाल के रख दो
अंधेरों से तुम्हें अब भी डर लगता होगा .
हो सके तो कुछ पुरानी मुलाकातें जला देना
कुछ तो नज़र आ ही जायेगा ....
कोशिश करती हूँ कि
आज और अभी जी लूँ बस ,
इतिहास बनते भला क्या देर लगती है ????

Monday, 25 February 2013

अब कभी वजहों का ज़िक्र नहीं होगा ....


अब कभी वजहों का ज़िक्र नहीं होगा 
एक बिंदिया का रिश्ता ऐसा ही होता है .....
तुमने यादों की फेहरिस्त तह करके 
दबा दी होगी कहीं -
मुझे मालूम है 
अक्सर नए कागज़ पर ही 
कविता लिखते हो तुम।
फिर भी रेत  में तलाशूंगी 
तुम्हारी तमाम तहरीरें 
क्या हुआ जो उँगलियों के पोर 
धुआं धुआं हो जायेंगे ?
मैं नहीं जानती 
ज़ख्म क्या होते हैं ,कैसे रिसते  हैं ...?
तुम्हारी मुस्कराहटें 
अब तक मेरे साथ जो  थीं ...!
इतना मुश्किल भी न होगा तुम्हारे लिए 
मेरे बगैर उन राहों से गुजरना -
बस ...मुड़ कर देखने की ज़हमत न करना,
रेत पर बने लाल निशान 
तुम्हें भाएंगे नहीं .....
मेरी खामोश कविता 
तुमसे ज्यादा बातें करती है 
कोशिश करना ,
उसके चेहरे पर नज़र न पड़े तुम्हारी ...
चाँद सितारे सब वापस अपनी जगह टंग गए हैं 
और कविता का सूना माथा 
तुमसे कुछ कहेगा नहीं .....
एक बिंदिया का रिश्ता 
बस ऐसा ही होता है ....!!!!

Saturday, 16 February 2013

वज़ह...


सुनो ,
जीने की वज़ह तलाशने में 
उम्र के लम्हे बिखेरते रहने से बेहतर है 
राह चलते काँटों को 
चुन चुन कर 
अपने आंगन में सजा लेना -
बर्फ सी पिघलती रातों को याद करके 
वक़्त की गर्माहट को जाया मत करो 
क्यूंकि 
रिश्ते जब टपकने लगते हैं 
तो अहसास के तमाम कटोरे
लबालब हो जाते हैं ......
मेरी आदत में अब भी शुमार है
तुम्हारी आँखों में झाँक कर
बिंदिया सजाने का शगल -
अब तक अनगिनत सितारे
आसमान से उतर कर
मेरे आइने के कोने में झिलमिला रहे हैं ....
जानती हूँ कविता और अंकगणित का फर्क !
बगैर शब्दों के अपनी बात कहना
कविता नहीं , यात्रा है --
एक शहर में शाम को विदा किये बिना
अगली सुबह का इंतजार देकर चले जाना
तुम्हें तसल्ली देता है
और मुझे दिन गिनने की वज़ह --!
तभी तो अक्सर मेरी कविता में
गणित गड्ड -मड्ड हो जाता है ......
सुनो -
याद रखने के लिए ,
पतझड़ और बसंत ही काफी नहीं होते
पत्थरों के मसीहा अक्सर बेरंग होते हैं !
अबकी बार जीने की वज़ह तलाशने से पहले -
तमाम रंग बुन लेना अपने सपनों में
फिर देखना ,
प्यार का रंग सिर्फ महकता ही नहीं -
इन्सान को खुदा की सूरत के
बहुत नज़दीक पहुंचा देता है ,,,,,,,,!!!

Tuesday, 12 February 2013

चलो आज.....



चलो आज वक़्त के कानों में 
गुनगुना दें वो तराने 
जिनकी धुन में गुम हुई थी 
तुम्हारी आँखों की नमी 
और अब तक वो बरसात वहीँ थमी हुई है .....

चलो उन दरख्तों की  छाँव तले 
जिन्हें छू कर हवा का खिलखिलाना 
तुम्हारे होठों पे 
फूल उगा देता है 
और अब तक वो गुलशन अधबना पड़ा है .....

चलो आज फिर तलाश लें 
वो लम्हे इस बसंत में 
जो छुप कर तुम्हारी तोहमतों का 
असर जी  रहे हैं 
और दर्द यूँ ही पीले हुए जा रहे हैं ......

सुनो ! अब तुम्हारी हंसी का नमक 
बहा दो मौसम के संग ,
तमाम झीलों की जुबां 
खारी  न हो जाये तो कहना .......!!!

Sunday, 10 February 2013

तुम कभी थे ही नहीं ..

तमाम गर्द झाड़कर किताबों की 
आज फिर से निकाली है 
वो पीले पन्नों वाली डायरी 
जिसके आखिरी शब्दों में 
स्याही की महक अब भी ताज़ा है ....
धुंधले होते हर्फ़ 
ताउम्र साथ निभाने का 
दिलासा देते देते थक कर ,
उस नीली कमीज़ वाली तस्वीर के कोने में 
मुंह छिपाए पड़े हैं 
जिसकी सलवटों में तुम 
मेरे नाम के अर्थ ढूँढा करते थे .
सच कहूँ तो रोज़ कैलेन्डर देख कर 
दिन की शुरुआत करने की आदत 
मैंने बदल ली है .
सिर्फ एक ही तारिख के 
आगे -पीछे के दिनों का हिसाब लगाने में 
काफी वक़्त लग जाता है मुझे ......
कभी कभी सुबह की चाय की भाप में 
झील किनारे का वो मंदिर उभर आता है 
जहाँ से शाम की आरती की घंटियाँ 
पानी की सतह पर तैरती 
मुझ तक पहुँचती हैं ....
इन्सान और फरिश्तों में फर्क करने की 
तुम्हारी कोशिशें अब भी जारी हैं 
जबकि ज़माने ने उन्हें कभी भी 
एक समझा ही नहीं .
चांदनी और बरसात ने 
शहरों के बीच की दूरियां कब नापी हैं ?
उनका बरसना कभी भीड़ की नज़रों में 
बदलाव का कारण नहीं बना !
जानते हो 
यादों की पगड़डिया अक्सर फिसलन भरी होती हैं ?
मैं अब भी बार बार वहीँ देखती हूँ तुम्हें 
जहाँ तुम कभी थे ही नहीं ......!!!