अब कभी वजहों का ज़िक्र नहीं होगा एक बिंदिया का रिश्ता ऐसा ही होता है .....
तुमने यादों की फेहरिस्त तह करके
दबा दी होगी कहीं -
मुझे मालूम है
अक्सर नए कागज़ पर ही
कविता लिखते हो तुम।
फिर भी रेत में तलाशूंगी
तुम्हारी तमाम तहरीरें
क्या हुआ जो उँगलियों के पोर
धुआं धुआं हो जायेंगे ?
मैं नहीं जानती
ज़ख्म क्या होते हैं ,कैसे रिसते हैं ...?
तुम्हारी मुस्कराहटें
अब तक मेरे साथ जो थीं ...!
इतना मुश्किल भी न होगा तुम्हारे लिए
मेरे बगैर उन राहों से गुजरना -
बस ...मुड़ कर देखने की ज़हमत न करना,
रेत पर बने लाल निशान
तुम्हें भाएंगे नहीं .....
मेरी खामोश कविता
तुमसे ज्यादा बातें करती है
कोशिश करना ,
उसके चेहरे पर नज़र न पड़े तुम्हारी ...
चाँद सितारे सब वापस अपनी जगह टंग गए हैं
और कविता का सूना माथा
तुमसे कुछ कहेगा नहीं .....
एक बिंदिया का रिश्ता
बस ऐसा ही होता है ....!!!!