Sunday, 29 December 2013

सख्त होते होते
पत्थर से चट्टान हो जाना
अब तक इतना आसान लगता था
आज जाना कि खारे पानी से
दरारें पड़ जाती हैं उसमें ...

सख्त ,कठोर ,संगदिल कहने भर से
चट्टानें नहीं तड़कतीं
ना ही वो खिसक कर उलझतीं हैं
पगडंडियों में -
जब कभी मौका मिले तो
दो डग चढ़ कर उन पर, पूछना
कि क्यूँ नहीं मौसम के रंग बदलते उनके लिए ?
क्यूँ बरिशे भीतर तक भिगोती नहीं उन्हें ?
और क्यूँ उन्हें कंकरों की तरह
झील में उछाले जाने की हसरत नहीं होती ?

कभी ये भी होगा कि
फूल बरसेंगे उस चौराहे पर
जहां से हम -तुम
अपनी अपनी राहें मुड गए थे
बगैर एक दूसरे की तरफ देखे
क्यूंकि-
जब गले तक उग आती है नागफनी
तब एक आह की गुजारिश भी
तमाम रास्ते भुला देती है
मुझसे तुम तक पहुँचने के .......!!!

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