Sunday, 29 December 2013

  1. क्यूँ सुने वह
    तुम्हारी हर उस गैर ज़रूरी बात को
    जिसकी आहट भर से
    कंपकपा उठती हैं उसकी उँगलियाँ
    बगैर कलम को ये बताए
    कि बाकी शब्दों का इंतज़ार 
    उसे उम्र भर करना होगा ?

    क्यूँ थामे रखेगी वह जीवन भर
    आसमान को अपने हाथों में
    जबकि तुम रोज़ बादलों की पैदावार को
    बिना उसे बताए
    न जाने किसकी उम्मीदों के खलिहान में
    छोड़ आते हो ?

    क्यूँ खुली रखे वह अपनी आँखें इस डर से
    कि तमाम अजन्मे स्वप्न
    इस बार भी उसकी पनीली कोरों की
    गहराई में समा कर
    अपनी पैदाइश की घड़ी को
    क़यामत तक पहुंचा कर ही दम लेंगे ?

    क्यूँ जवाब दे वह उन बेहिसाब सवालों का
    जिनके उग जाने भर से
    नागफनी के जंगलों की चुभन
    अपना सारा असर छोडकर
    हरसिंगार के सिरहाने
    निहत्थी बैठ जाती है ?

    सुनो -
    अब सिर्फ सुनेगी नही ---
    न ही वह हमेशा की तरह अपना हाल ही बताती रहेगी -
    अब वह महसूस करेगी
    उस मौलिक ,अप्रकाशित कविता को
    जिसके यूं ही लिख देने से ज्यादा ज़रूरी
    उसमें से तुम्हारी मौजूदगी का अहसास
    निकाल फेंकना है
    और यकीन मानो
    जिस दिन ऐसा कुछ हो गया
    तो उसका जीना नहीं -
    उसका मरना
    तमाम कोशिशों के बावजूद
    तुम्हारे चेहरे की मुस्कराहट
    कई जन्मों तक मिटा नहीं पाएगा ॰...!!!

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