Sunday, 29 December 2013

उस एक सुबह को साथ लिए
झील अब भी वहीं ठहरी हुई है
तमाम बारिशें थक गई-
पानी बाहर उफनता ही नहीं ...
कुछ मुस्कराहटें लहरों के साथ
जब तब करवटें बदलतीं हैं 
और-
न जाने क्यूँ नींद के झोंके बार बार
मंदिर की घण्टियों से सकपका जाते हैं ...
उम्मीद के घरोंदे
रोज़ बना के उजाड़ देती हूँ ,
गुलाबी रंग अक्सर नीला हो जाया करता है
और माथे के चाँद सितारे
अब सुदूर आसमान के आँगन में टंग गए हैं ...
ज़रूरी नहीं कि इतिहास पत्थरों पर ही लिखे जाएँ
जलते हुये दियों की दास्तां
हथेलियों की कालिख से भी सुनी जा सकती है ।
फूलों को कांटे समझे जाने का वक़्त
अब आ ही चुका है
फिर भी ---
आसमान के साथ साथ
सप्तमेष ग्रह के तमाम मंत्र
42000 बार दोहरा लिए हैं
जबकि जानती हूँ
कि प्रेम का इश्तहार नहीं होता ......!!!

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