Friday, 23 June 2017

तुम ढोती रहीं
केकड़े के जाल में जकड़ी
अपनी नश्वर काया को
अनात्मवाद की पैरवी करते हुए
अपनी आखिरी सांस तक।

तनिक भी न डगमगाईं
दर्द की गांठें लगा कर मोह के बंधनों को
प्रयाग के संगम में बहाते हुए,
जहाँ आज भी सुरों के सप्तक में
गूंजती हैं स्वर लहरियां
तुम्हारे शब्दों को गंगा का आचमन कराते हुए।

उस बगीचे की खरपतवार तक अनुद्विग्न है
जहाँ तुम हंसी के ठहाके लगातीं थीं
कबूतर, गिलहरियां और अनेक परिव्राजक
अब तुम्हारे प्रेम से रीते दाने निगलते हुए
तुम्हें प्रत्यास्मरण करते हैं।

तुम देख भी न पायीं अपनी अधमुंदी आंखों से
रिश्तों का वो बनावटी पैरहन
जो अब तक तुम्हारे 'अपने' बने
पहन कर घूमते हैं
और उसे तमाम
केकडों और मकड़ियों से बचा कर रखते हैं
बिना ये जाने कि जाल बुनने का हुनर
इंसानों को बे‍हतर आता है...!!!