Tuesday, 31 May 2011

टूटते सम्बन्ध



नई कोंपल की तरह
उगते ,फलते ,फूलते
नए सम्बन्ध
एकाएक झर जाते हैं
सूखे पत्तों की तरह .
     किन्तु मेरे और तुम्हारे सम्बन्ध
     जो कभी उगे ,फले ,फूले थे
     सूख कर भी
     जुडे हुए हैं आज.
    टूटेंगे !क्योंकि ये सम्बन्ध हैं
    पर तुम शोक मत करना
    तुम तो शाख हो
    नई कोंपल उगेगी तुम पर
    सूखा पत्ता तो मैं हूँ
    जिसे उड़ा ले जाएगी हवा
    धूल से मिल कर
     दुःख की पाती लिख जाएगी .
फिर भी इंतजार है
हवा के झोंके का,
जो आये और तोड़ कर मुझे
दूर कर दे तुमसे
क्योंकि ,
सूख कर भी जुड़े रहने की पीड़ा से
टूट कर गिर जाने का दर्द
कहीं बहुत कम होता है ....

Sunday, 29 May 2011

किसे मालूम था


किसे मालूम था कि
तुम्हारे सूरज की किरणे
चाँद की चांदनी 
और हवाओं की खुशबुएँ 
जोड़ देंगी कुछ सफ़ेद कागज 
मेरे खामोश दिनों में 
जिन पर लिख कर
रात की स्याही से 
धीरे धीरे बना दूंगी मैं 
एक नया शब्दकोष ..
तुम्हारी आत्मा हवा के लिबास में 
चुपके से उसे पढ़ कर लौट जाएगी 
और 
तब तक मेरी देह 
देवालय बन जाएगी .........

Wednesday, 25 May 2011

तुम्हारी नदी में


तुम्हारी मछलियों से की थी बातें मैंने
बूंदों पर उडती
धारों पर चढ़ती उतरती रंगीन मछलियाँ
अद्भुत अनोखे अनगिनत  आकार वाली मछलियाँ ...
      कहा था मैंने कि रंग तो मुझमें भी समाये हैं
      लगभग सारे ही -
      पर न जाने क्यों
      एक दूसरे में
     गड्ड-मड्ड हुए रहते हैं
     तुम जैसी रंगत दे नहीं पाते मुझे
     बस ,भीतर ही भीतर
     टकराते रहते हैं एक -दूसरे से
     ठोस पथरीले टुकड़ों क़ी तरह
     क्या इसलिए क़ि उन्हें
     किसी की रोम -रोम की पुलक ने
     नहीं जन्मा है ?
तुम्हारी मछलियों ने जवाब दिया -
शायद तुम्हारे रंगों को
इंतज़ार है अभी भी
किसी की द्रव्यता का
जिसमे घुल मिल कर
वे कर सकें तुम्हारी रंगत को भी
हम जैसा ही ....

Tuesday, 24 May 2011

तुमने आशीष दिया -
"सूरज- सी चमको दमको 
सर्वत्र फैलाओ अपनी आभा"
मैं चकित हुई , प्रसन्न हुई 
कि उन्नत हुई तुम्हारी विचारधारा . 
परन्तु फिर -
जब भी चमकना चाहा,
दमकना चाहा , 
रोशन होना चाहा
तुमने कहा -
"अपनी सीमायें पहचानो 
धुरी से विचलित न होओ
रहो आस पास अपने घेरे के "
      ठीक हैं-
       पर , फिर मैं सूरज कहाँ हुई?
       मैं तो पृथ्वी -सी ही रही 
       सिर झुकाए घूमती चारो तरफ 
       तुम्हारे निर्णय मानती 
       मौसम के अनुसार बदलती 
       काली छायाओं को ग्रहण करती 
       फिर मैं सूरज कहाँ हुई ?
शायद- 
तुम्हारा आशीष ही गलत था 
या फिर -
तुम्हारा स्वयं सूरज बने रहना ही उचित था...
किसे मालूम था कि
तुम्हारे सूरज की किरणे
चाँद की चांदनी 
और हवाओं की खुशबुएँ 
जोड़ देंगी कुछ सफ़ेद कागज 
मेरे खामोश दिनों में 
जिन पर लिख कर
रात की स्याही से 
धीरे धीरे बना दूंगी मैं 
एक नया शब्दकोष ..
तुम्हारी आत्मा हवा के लिबास में 
चुपके से उसे पढ़ कर लौट जाएगी 
और 
तब तक मेरी देह 
देवालय बन जाएगी .........

Friday, 20 May 2011

तुम्हारा साथ 

कभी कभी तुम्हारा साथ वैसा ही होता है 
जैसे बारिश की बूंदों में नहाये 
पेड़ों का हरापन 
या आसमान में पंछियों की 
कतारों का तिरछापन .
     सब कुछ दूधिया सा ,
     कहीं कहीं नीला भी 
     कुछ ऐसा -
     जिसमें संदेहों के सारे सितारे 
     टूटकर बिखर जाएँ 
     और 
     इतने दूर तक छिटक जाएँ 
     कि हमारी तुम्हारी किसी भी 
     दुआ -बद्दुआ से 
     कभी लौट कर न आयें ....

Thursday, 19 May 2011


यंत्रणा 

पारस को छूकर 
सोना बन जाने की चाहत 
पनीली आँखों को समुंदर 
पीने की आदत 
झिरती बूंदों को अंजलि में 
समेटने की मशक्कत 
उफनती लहरों से पत्थर 
उठाने की हरकत 
शब्दों को छंदों से 
बतियाने की फुर्सत 
फटने से पहले बम के 
परमाणु की हालत 
विचित्र है समय की 
परखने की ताकत -- -- --
           अवसाद के अधरों पर 
           प्रणय का अल्प -विराम 
           असंभव को पाने में 
           संवेगों का कोहराम 
           लगता है -
           यंत्रणा का दौर अभी 
           थमा नहीं है 
           जो शेष है 
           अशेष  अभी बना नहीं है .

Wednesday, 4 May 2011

तुम चले आये

जब भी तह करके
रखा स्मृतियों को
अपने वजूद के पिछले कोनो में/ सरकाकर
ये सोच कर कि
अब नहीं बिखरुंगी -तुम चले आये
बार- बार लगातार धकेलती रही
हथेलियों से -  आँधियों को
पीछे की ओर
ये सोचकर कि
 अब नहीं बहुंगी -तुम चले आये
रात भर करती रही/ ओस की  बूंदों से बातें
सुखाती रही
तकिये के किनारे का गीलापन / सुबह की किरणों से
ये सोच कर कि
अब नहीं बरसुंगी -तुम चले आये
मुस्कुराहटों से सजाये अँधेरे
खिलखिलाती रही दुपहरी
झिलमिलाती शामों के बिखरे से मंजर को संवारा
ये सोचकर कि
अब नहीं बहलुंगी -तुम चले आये
बार- बार लगातार धकेलती रही
हथेलियों से - आँधियों को
पीछे की ओर
ये सोचकर कि
 अब नहीं बहुंगी -तुम चले आये