तुम्हारा साथ
कभी कभी तुम्हारा साथ वैसा ही होता है
जैसे बारिश की बूंदों में नहाये
पेड़ों का हरापन
या आसमान में पंछियों की
कतारों का तिरछापन .
सब कुछ दूधिया सा ,
कहीं कहीं नीला भी
कुछ ऐसा -
जिसमें संदेहों के सारे सितारे
टूटकर बिखर जाएँ
और
इतने दूर तक छिटक जाएँ
कि हमारी तुम्हारी किसी भी
दुआ -बद्दुआ से
कभी लौट कर न आयें ....

मन को सहलाते और दुलराते हुए कविता बीत जाती है
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