किसे मालूम था कि
तुम्हारे सूरज की किरणे
चाँद की चांदनी
और हवाओं की खुशबुएँ
जोड़ देंगी कुछ सफ़ेद कागज
मेरे खामोश दिनों में
जिन पर लिख कर
रात की स्याही से
धीरे धीरे बना दूंगी मैं
एक नया शब्दकोष ..
तुम्हारी आत्मा हवा के लिबास में
चुपके से उसे पढ़ कर लौट जाएगी
और
तब तक मेरी देह
देवालय बन जाएगी .........
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