Tuesday, 24 May 2011

तुमने आशीष दिया -
"सूरज- सी चमको दमको 
सर्वत्र फैलाओ अपनी आभा"
मैं चकित हुई , प्रसन्न हुई 
कि उन्नत हुई तुम्हारी विचारधारा . 
परन्तु फिर -
जब भी चमकना चाहा,
दमकना चाहा , 
रोशन होना चाहा
तुमने कहा -
"अपनी सीमायें पहचानो 
धुरी से विचलित न होओ
रहो आस पास अपने घेरे के "
      ठीक हैं-
       पर , फिर मैं सूरज कहाँ हुई?
       मैं तो पृथ्वी -सी ही रही 
       सिर झुकाए घूमती चारो तरफ 
       तुम्हारे निर्णय मानती 
       मौसम के अनुसार बदलती 
       काली छायाओं को ग्रहण करती 
       फिर मैं सूरज कहाँ हुई ?
शायद- 
तुम्हारा आशीष ही गलत था 
या फिर -
तुम्हारा स्वयं सूरज बने रहना ही उचित था...

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