तुमने आशीष दिया -
"सूरज- सी चमको दमको
सर्वत्र फैलाओ अपनी आभा"
मैं चकित हुई , प्रसन्न हुई
कि उन्नत हुई तुम्हारी विचारधारा .
परन्तु फिर -
जब भी चमकना चाहा,
दमकना चाहा ,
रोशन होना चाहा
तुमने कहा -
"अपनी सीमायें पहचानो
धुरी से विचलित न होओ
रहो आस पास अपने घेरे के "
ठीक हैं-
पर , फिर मैं सूरज कहाँ हुई?
मैं तो पृथ्वी -सी ही रही
सिर झुकाए घूमती चारो तरफ
तुम्हारे निर्णय मानती
मौसम के अनुसार बदलती
काली छायाओं को ग्रहण करती
फिर मैं सूरज कहाँ हुई ?
शायद-
तुम्हारा आशीष ही गलत था
या फिर -
तुम्हारा स्वयं सूरज बने रहना ही उचित था...

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