Saturday, 9 July 2011

तलाश


समंदर की लहरों से टकराते 
विचारों के भंवर 
फटती मस्तिष्क की शिराएँ 
और 
उफनते भावनाओं के ज्वार--
तलाशो !
कहीं तो होगा 
निष्कासन का एक छिद्र 
जो संभव कर सके 
द्रवित संवेदनाओ का बहाव 
मनुष्य से मनुष्य की ओर ............!

Sunday, 3 July 2011



दूर तलक आ गयी हूँ संग तुम्हारे 
इतना -कि पीछे मुड़ कर देखूं तो 
सलेटी सा धुंआ नज़र आता है चारों ओर 
और सामने देखने की कोई वज़ह नहीं होती 
चाहती हूँ सिर्फ तुम्हारा साथ 
न आगे की राह का आभास 
न पीछे की पगडण्डी से वास्ता .
     अचानक सरका लेते हो तुम 
     आहिस्ता से अपना हाथ 
     मेरी हथेलियों के बीच से
     तितली के परों का सा 
     नर्म अहसास दिलाते हुए ,
     मैं विचर रही हूँ 
     संग -साथ की स्मृतियों की वाटिका में 
     परन्तु -
     मेरे स्वप्नों को यथार्थ से टकराते ,
     टूट कर चूर होते हुए भी 
    न देखा तुमने 
     और उजाड़ दी 
     भविष्य की कोख में पलती 
     मेरी आशाओं की फुलवारी 
     बेआवाज़ ....... 

Saturday, 2 July 2011

तुमसे मिलना

                      
जब भी चिलचिलाती धूप से बचने को 
फैलाओगे अपनी हथेलियाँ 
मुझे पाओगे अपनी अँगुलियों के 
पोरों के बीच में .
अपनी आँखों को भिगोना 
पानी के छींटों से और 
महसूस करना उन बूंदों को 
अपने चेहरे पर 
जिन्हें मैं यूँ ही बहता छोड़ आयी थी .
        हवा के झ्होंकों की अंगुली पकड़ कर 
        रास्ते बनाये थे मैंने 
        बादलों के गुस्से से बेपरवाह 
       भीगते हुए 
        तितलियों के पीछे पीछे भागी थी 
       कुछ दूर चल लेना वहां तक 
       बेमकसद ...
अगली बार तलाशुंगी
 तुम्हारे क़दमों के निशान 
उस झ्हरने के पास ,
पहाड़ की तलहटी में 
और जंगल के दरख्तों के बीच 
जहाँ रुक कर तुमने कुछ देर 
ताज़ी हवा भरी होगी अपनी सांसों में 
और लिया होगा मेरा नाम 
कई बार अपने होठों से ...
        लगता है हम यूँ ही मिलते रहेंगे 
        इन वादियों में हमेशा 
        एक साथ नहीं-
         एक के बाद एक 
        जुदा जुदा सा होगा ये मिलना 
        तुमसे तुम्हारे बाद----