दूर तलक आ गयी हूँ संग तुम्हारे
इतना -कि पीछे मुड़ कर देखूं तो
सलेटी सा धुंआ नज़र आता है चारों ओर
और सामने देखने की कोई वज़ह नहीं होती
चाहती हूँ सिर्फ तुम्हारा साथ
न आगे की राह का आभास
न पीछे की पगडण्डी से वास्ता .
अचानक सरका लेते हो तुम
आहिस्ता से अपना हाथ
मेरी हथेलियों के बीच से
तितली के परों का सा
नर्म अहसास दिलाते हुए ,
मैं विचर रही हूँ
संग -साथ की स्मृतियों की वाटिका में
परन्तु -
मेरे स्वप्नों को यथार्थ से टकराते ,
टूट कर चूर होते हुए भी
न देखा तुमने
और उजाड़ दी
भविष्य की कोख में पलती
मेरी आशाओं की फुलवारी
बेआवाज़ .......

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