Saturday, 11 June 2016

ना जाने क्यूँ नहीं देख पाए 
इधर उधर दुबके तारों को तुम ,
किसी की याद का घेरा भी था चाँद के चारों ओर 
और तमाम बादलों ने एक छोटा सा शहर ही बसा लिया था वहां .....
गीत और ग़ज़लें ना सही 
छिटपुट शेर बार बार मुंह निकाल
किसी की दाद के इंतजार में
अपनी पलकें झपकाते रहे रात भर ....
फिर कैसे कहते हो तुम
कि चाँद रात भर अकेला था????
उसने कहा वो कांटाहै 
मेरे जीवन में धंसा हुआ 
आर पार ---
स्मृतियों के जंगल से 
सुख दुःख के फूल पत्ते बटोरे थे एक दिन,
तभी चुभा होगा शायद ....
ढूँढ लेती उसी पल
बैठ के साये में उम्मीदों के
लेकिन -
रेत की परछाई भी गुमशुदा होती है......
जब भी कोई कडवाहट 
मेरी उँगलियों के पोरों से बहकर 
तुम्हारे सिर की नसों को सहला देती है 
तुम मुस्करा देते हो.....
उफ़!कितनी मिठास है तुम्हारे जीवन में.......!!!!
धूप की गंध 
लापरवाही के खुरदरे रंग ओढ़े 
तमाम पगडन्डियों की नमी को चटकाते हुये 
मेरे चारों ओर बस गयी है...
ऐसे में खूबसूरती शब्द ही 
उपहास उड़ाता प्रतीत होता है.
तुमने अब तक धधकती धरा पर
पानी के बीज नहीं बोये ना ?
कोशिश करके देखना
सिर्फ धुआं निकलता है...
धूप ,धुआं और धुंध -
इनका ख़याल निकले
तो बारिशों की रंगोली सजाऊँ !!!

Saturday, 4 June 2016



क्यूँ हलकी सी खरोंच को कुरेद कर
यूँ ही छोड़ देते हो
और ज़ख्मों की गिनती
बेवज़ह बढ़ जाती है .?
अब छोड़ दो यूँ तल्खियों में जीना 
ज़रा याद करके बताना कि -
क्या अब भी बाकी है
मेरी हथेलियों में बसी साँसें
तुम्हारे कंधे पे ??
जहाँ दम तोड़ने से पहले
हाथ ज़रा सा टिक गया था .....
अच्छा किया जो एक नदी के
रेगिस्तान बनने तक ठहरे नहीं तुम -
ना जाने कैसे टांग पाती
तुम्हारी याद की एक-एक मछली को मैं
आसमान से लटकती
तमाम उम्मीदों के सहारे ....!
जानती हूँ-
मैं तुम्हारा बीता हुआ कल हूँ
जिस पर तकलीफों की बेरहम धूल डाल
तुम आगे बढ़ चुके हो
बिना ये जाने
कि संवेदनाओं की एक बूँद के
गिर जाने भर से
उग पड़ेंगे उस धूल में
अब सिर्फ ---
यादों के कैक्टस ....!
अपनी तमाम बेरहम बददुआएं 
एक काले डोरे में बांध 
लटका आयी थी तुम्हारी मुस्कराती 
तस्वीर के गले में -
ये सोचकर कि औरों की ख़ुशी में 
अब कैसे हंस पाते हो तुम....!
नज़र के डिठौने सी काली,
जलती सी निगाह उस पर डाल कर ही
काम पे लगती थी -बेनागा ...
सब लापरवाही से करती इसी धुन में
कि अब किसे क्या फर्क पड़ेगा ??
रातों को जागकर सोचे गए
कैक्टेस से तीखे उलहानों की
बन्दनवार लटकती रोज़ सुबह-
कि कैसे कोई खिलती कली सी मुस्कराहट
दबे पाँव भीतर घुस कर,
मेरी बंद पलकों पे हौले से
शरारत भरी दस्तक दे जाएगी....!
लेकिन-
मेरे तमाम पुख्ता इंतजामों को 
धता बताकर ,
फिर से भेज दी एक किरन ख़ुशी की
मेरी अँधेरी ख़ामोशी में तुमने .
खुद से किये वादों के ,
बड़े जतन से बनाये सारे बदशक्ल साए-
ना जाने कहाँ गुम हो गए???
अब सोचती हूँ 
नाउम्मीदी की सभी खिड़कियाँ खोल 
उड़ा दूँ नाराज़गी के परिंदे 
किसी और के आकाश में ....
और किरन किरन जोड़ उगा लूँ 
सैंकड़ों रंगों वाला एक नया सूरज -
तुम्हारी काले डोरे वाली तस्वीर के 
चारों ओर ........!!!

मेरे तमाम पुख्ता इंतजामों को 
तहजीब के दौर में 
कुछ अनकहा बिखरा सा रह गया 
तुम्हारे और मेरे बीच .....
अजनबियत की अधबनी दीवार के पार 
एक कदम तुम चले होते ,
इस तरह मीलों के फासले तो न बनते
यूँ ही .....

Friday, 3 June 2016

वेदना

आह निकली मन से मेरे 
चोट जब तन पर लगी ,
सुन सको तो सुन लो भाई 
त्रासदी इस शाख़ की ।

दे दिया सब कुछ हमारा 
बिन लिए बदले में कुछ ,
ठान लेते हम न देना 
सांस सबकी जाती रुक ।

क्यूँ नहीं दिखते तुम्हें 
आँसू हमारी आँख में ?
क्यूँ नहीं दिखता लहू 
बहता हमारी शाख़ में ?

गिर रही लाशें हमारी 
पर तुम पसीजे क्यूँ नहीं ,
हम नहीं तो तुम नहीं 
ये तुम समझते क्यूँ नहीं ??