आह निकली मन से मेरे
चोट जब तन पर लगी ,
सुन सको तो सुन लो भाई
त्रासदी इस शाख़ की ।
दे दिया सब कुछ हमारा
बिन लिए बदले में कुछ ,
ठान लेते हम न देना
सांस सबकी जाती रुक ।
क्यूँ नहीं दिखते तुम्हें
आँसू हमारी आँख में ?
क्यूँ नहीं दिखता लहू
बहता हमारी शाख़ में ?
गिर रही लाशें हमारी
पर तुम पसीजे क्यूँ नहीं ,
हम नहीं तो तुम नहीं
ये तुम समझते क्यूँ नहीं ??
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