Friday, 3 June 2016

वेदना

आह निकली मन से मेरे 
चोट जब तन पर लगी ,
सुन सको तो सुन लो भाई 
त्रासदी इस शाख़ की ।

दे दिया सब कुछ हमारा 
बिन लिए बदले में कुछ ,
ठान लेते हम न देना 
सांस सबकी जाती रुक ।

क्यूँ नहीं दिखते तुम्हें 
आँसू हमारी आँख में ?
क्यूँ नहीं दिखता लहू 
बहता हमारी शाख़ में ?

गिर रही लाशें हमारी 
पर तुम पसीजे क्यूँ नहीं ,
हम नहीं तो तुम नहीं 
ये तुम समझते क्यूँ नहीं ??

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