Saturday, 11 June 2016

ना जाने क्यूँ नहीं देख पाए 
इधर उधर दुबके तारों को तुम ,
किसी की याद का घेरा भी था चाँद के चारों ओर 
और तमाम बादलों ने एक छोटा सा शहर ही बसा लिया था वहां .....
गीत और ग़ज़लें ना सही 
छिटपुट शेर बार बार मुंह निकाल
किसी की दाद के इंतजार में
अपनी पलकें झपकाते रहे रात भर ....
फिर कैसे कहते हो तुम
कि चाँद रात भर अकेला था????

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