तहजीब के दौर में
कुछ अनकहा बिखरा सा रह गया
तुम्हारे और मेरे बीच .....
अजनबियत की अधबनी दीवार के पार
एक कदम तुम चले होते ,
इस तरह मीलों के फासले तो न बनते
यूँ ही .....
कुछ अनकहा बिखरा सा रह गया
तुम्हारे और मेरे बीच .....
अजनबियत की अधबनी दीवार के पार
एक कदम तुम चले होते ,
इस तरह मीलों के फासले तो न बनते
यूँ ही .....
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