Saturday, 4 June 2016

अपनी तमाम बेरहम बददुआएं 
एक काले डोरे में बांध 
लटका आयी थी तुम्हारी मुस्कराती 
तस्वीर के गले में -
ये सोचकर कि औरों की ख़ुशी में 
अब कैसे हंस पाते हो तुम....!
नज़र के डिठौने सी काली,
जलती सी निगाह उस पर डाल कर ही
काम पे लगती थी -बेनागा ...
सब लापरवाही से करती इसी धुन में
कि अब किसे क्या फर्क पड़ेगा ??
रातों को जागकर सोचे गए
कैक्टेस से तीखे उलहानों की
बन्दनवार लटकती रोज़ सुबह-
कि कैसे कोई खिलती कली सी मुस्कराहट
दबे पाँव भीतर घुस कर,
मेरी बंद पलकों पे हौले से
शरारत भरी दस्तक दे जाएगी....!
लेकिन-
मेरे तमाम पुख्ता इंतजामों को 
धता बताकर ,
फिर से भेज दी एक किरन ख़ुशी की
मेरी अँधेरी ख़ामोशी में तुमने .
खुद से किये वादों के ,
बड़े जतन से बनाये सारे बदशक्ल साए-
ना जाने कहाँ गुम हो गए???
अब सोचती हूँ 
नाउम्मीदी की सभी खिड़कियाँ खोल 
उड़ा दूँ नाराज़गी के परिंदे 
किसी और के आकाश में ....
और किरन किरन जोड़ उगा लूँ 
सैंकड़ों रंगों वाला एक नया सूरज -
तुम्हारी काले डोरे वाली तस्वीर के 
चारों ओर ........!!!

मेरे तमाम पुख्ता इंतजामों को 

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