Saturday, 4 June 2016

अच्छा किया जो एक नदी के
रेगिस्तान बनने तक ठहरे नहीं तुम -
ना जाने कैसे टांग पाती
तुम्हारी याद की एक-एक मछली को मैं
आसमान से लटकती
तमाम उम्मीदों के सहारे ....!
जानती हूँ-
मैं तुम्हारा बीता हुआ कल हूँ
जिस पर तकलीफों की बेरहम धूल डाल
तुम आगे बढ़ चुके हो
बिना ये जाने
कि संवेदनाओं की एक बूँद के
गिर जाने भर से
उग पड़ेंगे उस धूल में
अब सिर्फ ---
यादों के कैक्टस ....!

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