Tuesday, 22 March 2016

अमावस के सुबह होने तक
सरसराती फागुनी हवाएँ
 न जाने कितने आंचलों को
सर से सरका कर गुज़र गयीं
पर ,
गली के आखिरी छोर वाले घर की
वो चौड़ी चौखट वाली खिड़की
टस से मस ना हुई....
यादों की फसल सुनहली होकर
इस पूरनमासी तक पक जाएगी
कुछ खिलंदड़ किशोर
चटका के ले भी जायेंगे दो -चार डालियाँ
करने होलिका के हवाले ,
तब अलसुबह -
बूढी हथेलियाँ किवाड़ धकेल कर
टटोलेंगी
जनने का उपकार चुका रही
पीढ़ी के तलवों की छुअन -
 बचपन के आँगन की मिट्टी में !!!


Saturday, 19 March 2016

हरे रक्त की बौछारें
लौट गईं आसमान की ओर
वापस!!!
मुमकिन है
ढूँढ न पाईं हों
अडिग -अटल अरावली के
दो -चार गोल घुमावदार पत्थर
जो जा छिपे हों लुढक कर कहीं
किसी अँधेरी खदान में.
रक्त को तो अब रंगहीन होना ही है
बिलकुल पानी- सा !
बौछारों...... तुम बरसो!!!!
फर्क न करो
रक्त और पानी में ,
हरा हो या लाल
वाष्पित तो होगा नहीं वह -
सिर्फ बहेगा जीवन की शिराओं में ...
और सुनो --
खदानों में अब सूरज नहीं निकलते !!!!




.रंग


हरी वादियाँ ,सुनहरी रेत
नीला समन्दर ,पीले खेत
लाल है टेसू ,गुलाबी हैं गाल
गेरुआ-सा मन,सतरंगी है गात
सुनो......रंग बतियाते भी हैं !!

प्रेम प्रीत का रंग हो गहरा
राग द्वेष नहीं रहे सदा
मुस्कान बिखेरे आती हवा
फागुन महकाए जाता फिज़ा
सुनो...... रंग गुनगुनाते भी हैं !!

भाँग का सुरूर ,उपहारों की उमंग
फुहारें ख़ुशी की ,मस्ती के संग
बीते बरस की यादें अपार
ग़मों को भिगोए प्यार की बौछार 
सुनो.......रंग बहकाते भी हैं !!!  

Sunday, 13 March 2016

तेजाबी चेहरों को जिलाने से
अन्तर्मन के चिथडों में विभाजित होने तक
एक पूरा का पूरा
भ्रमित अध्याय लिख जाते हो तुम -
जलन ,सिर्फ तेजाब ही नहीं देता
चिथड़े ,बारूद के ढेर की ही उपज नहीं होते .......
लिखो !
पुनः लिखो यह अध्याय !
इस बार भ्रम सर्वथा परे रहें 
कविता के सत्य से......!!!

Saturday, 5 March 2016

एक दर्द ,एक अहसास,एक राह 
परिंदे यूँ ही साथ उड़ कर नहीं आते मीलों दूर
भरोसा बाँधता भी है....!
बंधन सभी उलझते नहीं
कुछ खुल कर ज़्यादा दुखद हो जाते हैं।
देखना, पिछली बार की तरह इस बार भी
सफ़ेद उम्मीदों पे सतरंगी ख़्वाब बिखरेंगे
और फागुन आ कर जाने का नाम न लेगा
चाहे रंग कितने ही फीके क्यूँ ना पड़ जाएँ ....
तमाम गाँठों को खोलकर
उछाल देना आसमान की ओर
कोई न कोई परिंदा दबा ही लेगा अपनी चोंच में
और-
सुदूर बँट जायेगा हमारा साँझा अहसास
गोधूली के रंगों  के रूप में
बग़ैर अपना उजलापन खोए........!!