अमावस के सुबह होने तक
सरसराती फागुनी हवाएँ
न जाने कितने आंचलों को
सर से सरका कर गुज़र गयीं
पर ,
गली के आखिरी छोर वाले घर की
वो चौड़ी चौखट वाली खिड़की
टस से मस ना हुई....
यादों की फसल सुनहली होकर
इस पूरनमासी तक पक जाएगी
कुछ खिलंदड़ किशोर
चटका के ले भी जायेंगे दो -चार डालियाँ
करने होलिका के हवाले ,
तब अलसुबह -
बूढी हथेलियाँ किवाड़ धकेल कर
टटोलेंगी
जनने का उपकार चुका रही
पीढ़ी के तलवों की छुअन -
बचपन के आँगन की मिट्टी में !!!
सरसराती फागुनी हवाएँ
न जाने कितने आंचलों को
सर से सरका कर गुज़र गयीं
पर ,
गली के आखिरी छोर वाले घर की
वो चौड़ी चौखट वाली खिड़की
टस से मस ना हुई....
यादों की फसल सुनहली होकर
इस पूरनमासी तक पक जाएगी
कुछ खिलंदड़ किशोर
चटका के ले भी जायेंगे दो -चार डालियाँ
करने होलिका के हवाले ,
तब अलसुबह -
बूढी हथेलियाँ किवाड़ धकेल कर
टटोलेंगी
जनने का उपकार चुका रही
पीढ़ी के तलवों की छुअन -
बचपन के आँगन की मिट्टी में !!!
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