Saturday, 19 March 2016

हरे रक्त की बौछारें
लौट गईं आसमान की ओर
वापस!!!
मुमकिन है
ढूँढ न पाईं हों
अडिग -अटल अरावली के
दो -चार गोल घुमावदार पत्थर
जो जा छिपे हों लुढक कर कहीं
किसी अँधेरी खदान में.
रक्त को तो अब रंगहीन होना ही है
बिलकुल पानी- सा !
बौछारों...... तुम बरसो!!!!
फर्क न करो
रक्त और पानी में ,
हरा हो या लाल
वाष्पित तो होगा नहीं वह -
सिर्फ बहेगा जीवन की शिराओं में ...
और सुनो --
खदानों में अब सूरज नहीं निकलते !!!!




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