Sunday, 27 May 2012


तुम बार बार मेरे शब्दों से परे क्यूँ चले जाते हो?
हर बार नई कहानी गढ़ तुम्हे मनाया
अपनी सारी कवितायेँ तुम्हारे रास्ते बिछा दीं
तमाम बिम्बों की छाया कर राहत बिखेरी
फिर भी-
सोच की एक एक कतरन समेट बनाई
मेरी संवेदनाओं की पैरहन
कितनी बेरहमी से उधेड़ दी तुमने !
कभी सोचा कि अब भी मेरे आईने में
क्यूँ तुम्हारा ही अक्स आ खड़ा होता है?
मुस्कराहटों का मखौल उड़ाती पीडाएं
क्यूँ तुम्हारे चेहरे से फिसल
मेरे ही बर्दाश्त के आंगन में घर बनाती हैं?
सोचो!दूरियों से उपजे सारे फीके रंग
बेमकसद घूम फिर कर ,
मेरी ही आँखों में क्यूँ बस जाते हैं?
भला तुम कैसे दोगे इन सवालों के जवाब!!!
खामोश शहर के सन्नाटों को
तुम्हारे दो शब्दों का अरसे से इंतजार है ...
ना जाने हाथ छुड़ा कर जाने की तुम्हारी ये आदत कब जाएगी????

Saturday, 26 May 2012

उदासी आज फिर सिरहाने खड़ी है

 
उदासी आज फिर सिरहाने खड़ी है....
सवेरे बहुतेरी चिड़ियों को चुग्गा डाला
बगीचे का चक्कर भी लगा आयी 
तमाम मुरझाये फूलों से मुस्कराहट बांटी
सूरज से ओट भी की हथेलियाँ फैला कर 
मगर एक कोर भी न भीगी 
मोगरे की बिसूरती कली की- 
बस,यहीं से उदासी ने हाथ थाम लिया .....
      उनींदी दोपहर को फटकार लगाई 
     तो अचकचाकर उठ खड़ी हुई बेचारी  
     दो लोटे पानी पिलाया कचरा टटोलते भीखू को 
     और उलझती लटों की परवाह किये बगैर 
     धूल भरी बदली को बरसने का वादा याद दिलाया 
     मगर झट से नकार कर चलती बनी वह 
     बेगैरत कहीं की......!
    ज़रा सी राहत देना भी बर्दाश्त नहीं उसे 
    पेड़ों के तपते बदन को ...
रात से गुज़ारिश की ना बीतने की 
तो उसने माथे पे शिकन डाल 
चांदनी सूख जाने का बहाना बना डाला 
बस यूँ ही-
तमाम कोशिशें करती रही 
कि मन की आंच तुम तक ना पहुंचे 
फिर भी ना जाने क्यूँ 
उदासी आज सिरहाने खड़ी है .......! 

Thursday, 17 May 2012

काश! तुम स्त्री होते



काश! तुम स्त्री होते 
और समझते, 
महसूस करते उस पीड़ा को 
जो तुम हमें रोजाना देते हो, हर पल -
घरों ,चौराहों ,दफ्तरों और एकांत में.
तुम देखते 
अपनी ही आँखों से लुटते हुए 
अपना सर्वस्व 
छोटी छोटी बातों पर. 
तुम देखते मेरे समर्पण को 
और तौलते अपने अहंकार को 
मेरे विश्वास और अपने विश्वासघात के 
तराजू पर.
तुम समझते रिश्तों के यथार्थ को 
जिसे निभाते निभाते 
मैं आखिरी साँस तक 
भूल जाती हूँ अपना अस्तित्व ,
और देखने लगती हूँ 
तुम्हारे अस्तित्व के दर्पण में 
स्वयं को.
मगर तब मैं कहाँ होती हूँ???
जिधर देखती हूँ सिर्फ तुम ही तुम होते हो
मेरा अतीत,वर्तमान-भविष्य 
और तुमसे लिपटा मेरा अनंत भी.
अच्छा अब मान भी जाओ 
और एक पल को स्त्री बन कर देखो
नागों से लिपटे चन्दन की तरह....
अरे!तुम तो कल्पना भर से ही सिहर गए?
चलो जाने दो!
सत्य ,काल की सीमाओं से परे 
मेरा स्त्री बने रहना ही
तुम्हारे पुरुष होने को
परिभाषित करता रहेगा....!


Saturday, 12 May 2012

कैसे लिख दूँ माँ पर कविता?



कैसे लिख दूँ माँ पर कविता?
यूँ ही जैसे लिखती हूँ 
सूरज चाँद की रौशनी पर 
या फिर समंदर की गहराई पर?
अक्सर लिखा है प्रेम के अदभुत रंगों पर 
और नफरत की शिद्दतों पर भी -
अब कलम ही नहीं चलती
दूध के क़र्ज़ या आँचल की छाँव ,
लोरी की गुनगुनाहट या गोद की गर्माहट
जैसे लफ्जों पर!
कैसे लिख दूँ उन तमाम आशीर्वचनों पर
जिनके कवच सरीखे अहसास
कितना महफूज़ महसूस कराते हैं .
उन आंसुओं तले धुंधली होती नज़र को
कौनसे शब्दों का जामा पहनाऊं
जो वक़्त-बेवक्त की तकलीफों में
मेरे हिस्से का दर्द भी तुमसे साझा कर लेती हैं?
कैसे लिख दूँ माँ की कंपकपाती
हथेलियों की इबारत ,
जिनमें समाई कोमलता अक्सर
अब भी सिरहाने पसर जाती है
और रूह को ठंडक भरी तसल्ली दे जाती है ...
समय की सिरहन से गीला होता मन
न जाने क्यूँ उँगलियों का सहारा नहीं बन पाता
फिर भला कैसे संभव है
मेरे और माँ के बीच
सिर्फ एक कविता का सम्बन्ध?????