Saturday, 12 May 2012

कैसे लिख दूँ माँ पर कविता?



कैसे लिख दूँ माँ पर कविता?
यूँ ही जैसे लिखती हूँ 
सूरज चाँद की रौशनी पर 
या फिर समंदर की गहराई पर?
अक्सर लिखा है प्रेम के अदभुत रंगों पर 
और नफरत की शिद्दतों पर भी -
अब कलम ही नहीं चलती
दूध के क़र्ज़ या आँचल की छाँव ,
लोरी की गुनगुनाहट या गोद की गर्माहट
जैसे लफ्जों पर!
कैसे लिख दूँ उन तमाम आशीर्वचनों पर
जिनके कवच सरीखे अहसास
कितना महफूज़ महसूस कराते हैं .
उन आंसुओं तले धुंधली होती नज़र को
कौनसे शब्दों का जामा पहनाऊं
जो वक़्त-बेवक्त की तकलीफों में
मेरे हिस्से का दर्द भी तुमसे साझा कर लेती हैं?
कैसे लिख दूँ माँ की कंपकपाती
हथेलियों की इबारत ,
जिनमें समाई कोमलता अक्सर
अब भी सिरहाने पसर जाती है
और रूह को ठंडक भरी तसल्ली दे जाती है ...
समय की सिरहन से गीला होता मन
न जाने क्यूँ उँगलियों का सहारा नहीं बन पाता
फिर भला कैसे संभव है
मेरे और माँ के बीच
सिर्फ एक कविता का सम्बन्ध?????

2 comments:

  1. maa ka varnan sach me nahi kiya ja sakta Neelam ji , uske kisi bhi karya kalapon gatividhiyon kee koi bhee vyakhya nahi ho sakti Neelam ji .aapne sahi kaha hai ki apki lekhnee maa ke vritton ko kavita me nahi dhaal saktee . behad behad
    sanvedansheel rachna . meri badhai sweekarein . :)

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