Sunday, 27 May 2012


तुम बार बार मेरे शब्दों से परे क्यूँ चले जाते हो?
हर बार नई कहानी गढ़ तुम्हे मनाया
अपनी सारी कवितायेँ तुम्हारे रास्ते बिछा दीं
तमाम बिम्बों की छाया कर राहत बिखेरी
फिर भी-
सोच की एक एक कतरन समेट बनाई
मेरी संवेदनाओं की पैरहन
कितनी बेरहमी से उधेड़ दी तुमने !
कभी सोचा कि अब भी मेरे आईने में
क्यूँ तुम्हारा ही अक्स आ खड़ा होता है?
मुस्कराहटों का मखौल उड़ाती पीडाएं
क्यूँ तुम्हारे चेहरे से फिसल
मेरे ही बर्दाश्त के आंगन में घर बनाती हैं?
सोचो!दूरियों से उपजे सारे फीके रंग
बेमकसद घूम फिर कर ,
मेरी ही आँखों में क्यूँ बस जाते हैं?
भला तुम कैसे दोगे इन सवालों के जवाब!!!
खामोश शहर के सन्नाटों को
तुम्हारे दो शब्दों का अरसे से इंतजार है ...
ना जाने हाथ छुड़ा कर जाने की तुम्हारी ये आदत कब जाएगी????

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