तुम्हारे परोसे हुए दर्दों में से
कुछ निवाले मैं ले आई हूँ अपने साथ
न जाने कितने नामों की परछाइयाँ
पीछे खिंची चली आई
जिनमे से कुछ को तो मैं
पहचानती भी नहीं
तुमसे रहा होगा कुछ रिश्ता उनका
तभी तो अपने से लगे वे मुझे भी
दर्द का रिश्ता
ऐसा ही होता होगा शायद ......