तुम्हारे परोसे हुए दर्दों में से
कुछ निवाले मैं ले आई हूँ अपने साथ
न जाने कितने नामों की परछाइयाँ
पीछे खिंची चली आई
जिनमे से कुछ को तो मैं
पहचानती भी नहीं
तुमसे रहा होगा कुछ रिश्ता उनका
तभी तो अपने से लगे वे मुझे भी
दर्द का रिश्ता
ऐसा ही होता होगा शायद ......
तुम्हारे परोसे हुए दर्दों में से
ReplyDeleteकुछ निवाले मैं ले आई हूँ अपने साथ
नीलम जी शायद आपका ब्लॉग पहली बार देखा
बहुत ही संवेदनशील रचना से रूबरू हुआ , आभार
thanx Sunil ji.
ReplyDeletevery sentimental poetry touching the innermost feelings of a tender herat.
ReplyDeletemy best wishes.
dr.bhoopendra