Saturday, 8 March 2014

देखना इस बार फागुन में मछलियाँ सुनहरी होकर गुलाबी फूलों का पता पूछेंगी और परिंदे आसमानी हो जाएंगे - झील के हरेपन में पर्वतों का रंग गड्डमड्ड हो जाएगा और पत्थरों का सुर्ख रंग गुलमोहर उधार माँगेगा - नीली पगडंडियाँ कुदरती बसंती होकर महकेंगी जहां दो चार भूरे- पीले फरिश्ते तुमसे सवाल जवाब करते नज़र आएंगे - बैंगनी दरख्तों से गुनगुनाने की मनुहार मत करना ,
वहाँ बूढ़े होते तनों में छिपा कर रखीं सलेटी यादें अब तक काली पड़ गईं होंगी ! सुनो - मैं इस बार फागुन में सफ़ेद दुपट्टा ओढ़े निकलूंगी और देखना - फिर भी बेरंग बेदाग ही वापस आ जाऊँगी सिर से पाँव तक सिर्फ तुम्हारी प्रीत के रंग में रंगने को !!!
तुम्हारे उलाहने वक़्त रहते अकेले पड़ जाएंगे ...देखना अब चाँद की नज़र ...मुझे देखती तुम्हारी ...निगाहों से ना हटेगी ....!!!
दफनाये हुये जिस्म चुप नहीं रहते ...एक खामोश जिंदगी बिताने के बाद ...!अक्सर दबी सी गुफ़्तगू होती है उनकी खाक में मिले अरमानों से !!!!