देखना इस बार फागुन में
मछलियाँ सुनहरी होकर
गुलाबी फूलों का पता पूछेंगी
और परिंदे आसमानी हो जाएंगे -
झील के हरेपन में
पर्वतों का रंग गड्डमड्ड हो जाएगा
और पत्थरों का सुर्ख रंग
गुलमोहर उधार माँगेगा -
नीली पगडंडियाँ
कुदरती बसंती होकर महकेंगी
जहां दो चार भूरे- पीले फरिश्ते
तुमसे सवाल जवाब करते नज़र आएंगे -
बैंगनी दरख्तों से गुनगुनाने की
मनुहार मत करना ,
वहाँ बूढ़े होते तनों में छिपा कर रखीं सलेटी यादें अब तक काली पड़ गईं होंगी ! सुनो - मैं इस बार फागुन में सफ़ेद दुपट्टा ओढ़े निकलूंगी और देखना - फिर भी बेरंग बेदाग ही वापस आ जाऊँगी सिर से पाँव तक सिर्फ तुम्हारी प्रीत के रंग में रंगने को !!!
वहाँ बूढ़े होते तनों में छिपा कर रखीं सलेटी यादें अब तक काली पड़ गईं होंगी ! सुनो - मैं इस बार फागुन में सफ़ेद दुपट्टा ओढ़े निकलूंगी और देखना - फिर भी बेरंग बेदाग ही वापस आ जाऊँगी सिर से पाँव तक सिर्फ तुम्हारी प्रीत के रंग में रंगने को !!!
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