Thursday, 5 January 2017

जानते हो  -
मोहब्बतों के सफ़र पूरे हुए बग़ैर ही ख़त्म होते हैं
और उनमें मौसमों की ख़ुश्की
तमाम ग़ैर ज़रूरी वजहों से हमेशा बनी रहती है
लोग अब मौसम के ऐसे मिज़ाजों से नाउम्मीद ही रहते हैं
क्योंकि उनकी उम्मीदों की तलाश
दरअसल कभी शुरू ही नहीं हुई थी।
वे जानते हैं कि सूरज के सिवाय ,रिश्तों की गर्माहट की
कोई और वजह होना नामुमकिन है
और सूरज की नीली आँखों ने
अब और रंग उधार देने बंद कर दिए हैं।

सर्द सुबहों में लिहाफ़ ओढ़े,आख़िरी बार किस्से सुन लेना
अब बर्दाश्त होने लगा है
क्योंकि रात भर चले इन क़िस्सों के पाँवों में,
छालों की जगह रिसती आहों की भाप जमी हुई है
जिसे सिर्फ़ दो हथेलियों की गर्माहट की दरकार है।

इन दिनों कोहरे की दीवारें रास्ता भी नहीं रोकतीं...
उनके उगने से पहले ही आँखों की रेत का सफ़र
उसी मोड़ पे जा कर ख़त्म हो चुका है
जहाँ की पगडंडियाँ अब इंतज़ार करना भूल चुकी हैं -
वे यह भी भूल चुकीं हैं कि किस्से हमेशा वहीँ ख़त्म होते हैं
जहाँ  से शुरू हुए थे
बग़ैर उन मौसमों की परवाह किये
जिन्हें जाने के बाद आने की कभी जल्दी नहीं होती ......!!!