- कैसे लिख दूँ माँ पर कविता? यूँ ही जैसे लिखती हूँ सूरज चाँद की रौशनी पर या फिर समंदर की गहराई पर? अक्सर लिखा है प्रेम के अदभुत रंगों पर और नफरत की शिद्दतों पर भी - अब कलम ही नहीं चलती दूध के क़र्ज़ या आँचल की छाँव , लोरी की गुनगुनाहट या गोद की गर्माहट जैसे लफ्जों पर! कैसे लिख दूँ उन तमाम आशीर्वचनों पर जिनके कवच सरीखे अहसास कितना महफूज़ महसूस कराते हैं . उन आंसुओं तले धुंधली होती नज़र को कौनसे शब्दों का जामा पहनाऊं जो वक़्त-बेवक्त की तकलीफों में मेरे हिस्से का दर्द भी तुमसे साझा कर लेती हैं? कैसे लिख दूँ माँ की कंपकपाती हथेलियों की इबारत , जिनमें समाई कोमलता अक्सर अब भी सिरहाने पसर जाती है और रूह को ठंडक भरी तसल्ली दे जाती है ... समय की सिरहन से गीला होता मन न जाने क्यूँ उँगलियों का सहारा नहीं बन पाता फिर भला कैसे संभव है मेरे और माँ के बीच सिर्फ एक कविता का सम्बन्ध?????
Sunday, 27 April 2014
Monday, 21 April 2014
मैंने वो हरेक लफ़्ज सुना है
जो तुमने कभी कहा ही नहीं -
दरअसल मैं अक्सर वही सब सुन पाती हूँ
जो तुम्हारी रूह के इर्द गिर्द नागफनी सा उगा रहता है
कई बार उस आवाज़ से उलझ कर
मेरी बेबसी के टुकड़े टुकड़े हुये हैं
और अनसुनी कराहों की अनगिनत मौतें हुईं हैं ....
मैं हर दिन आसमान का भटकना
और शीशों का टूटना महसूस करती हूँ
लेकिन हार जीत के खिलाफ
उलटते पासों की सरगोशियाँ
अब तक मेरी बर्दाश्त के बाहर है ...
हाँ ,वक़्त आने पर मेरे गीतों की खामोश धुनें
तुम्हारी समझ के घेरे में आ ही जाएंगी
पर तब तक तुम्हारी आँखों का रंग
लाल से सफ़ेद हो चुका होगा ...!
मैं जानती हूँ कि अनसुना रह जाना
कितना तकलीफ देता है !
लेकिन किस्मत की लकीरें बदलने के लिए
पत्थरों का नुकीला होना ज़रूरी नहीं -
दुनिया भर के तमाम अहसासों के साथ
यह महसूसना भी उतना ही सुकून देता है
कि हार जीत की धूप छांव से परे उग रही
वक़्त की नन्ही कोंपलों को
मेरे माथे की चमक से सहलाना
उनके दरख्त बन जाने तक उतना ही ज़रूरी है
जितना ज़रूरी तुम्हारे लिए
भीड़ में अकेला होना है ....!!!!!
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