Sunday, 27 July 2014

हर जाने अनजाने शख्स की तलाश की मैंने 
मगर सिर्फ खुद को ही पाया वहां 
तमाम पगडंडियाँ भर चुकी थीं 
झाड़ियों से 
और मेरे पैरों के निशानों का 
भ्रम भी नहीं था कहीं भी -
मालूम है अन्तरिक्ष में बसने लगे हैं लोग 
और परियों से दोस्ताना भी है मेरा 
पर यूँ इस तरह गुमशुदा नहीं हुआ जाता! !
मुझे लगा था मैंने ही वह शहर छोड़ा है .....मगर ....
दरअसल 
वह शहर ही मुझे छोड़ गया कभी का .......!!!
तुम्हारे सपनों से लदी 
मेरी पलकें 
बोझिल हो चुकीं है अब 
फिर भी पत्थरों से 
कुछ नहीं कहा मैंने .
सुना है पत्थरों को चिनवाते हैं 
मकानों में 
और उन मकानों में रहने वालों का 
कोई सपना बचता ही नहीं .....
खिड़की -दरवाजों के रंगों में 
उलझे वे लोग
बाहर के आसमान का सिन्दूरी होता रंग
और बादलों की चाँद से लुका छिपी का
संगीत समझ ही नहीं पाते !!!
मैंने अब तक सारा संगीत भी
तुम्हें नहीं दिया है
बाकी बची तोहमतों के बदले
रेत के समंदर पर
अपने ख्वाब बिखेर दूँगी ,
तुमसे किये तमाम वादे भी पूरे
नहीं करुँगी मैं ....
अधूरी ख्वाहिशों से जनमती हैं गुजारिशें .
मुझे चाहिए वो सब
जो बाकी है ....!!!
तभी ये बोझिल पलकें
गुम हो पाएंगी
उस अँधेरे सूरज की रौशनी में
जिसमें अब कोई
सपने नहीं देखता ..........!!!

Saturday, 12 July 2014

कागज़ की तरह तुड़े मुड़े अहसासों को
हथेली से सपाट करके
तहा  कर रखा एक कोने में
ऐश ट्रे तुम्हारे पुराने जुराबों में ढूंस कर
सरका दी है दुछत्ती पे
यहाँ वहां बिखरे डियो के कैन
कल ही कबाड़ी को दिए
एक दो बिना रिफिल के पैन थे
और कुछ फाइल कवर्स भी
सब डस्ट बिन को नज़र किये।
दराज़ में दिखी नहीं तुम्हारी
बकवास गानों वाली सी डीज़ और पेन ड्राइव्स
शायद समेट ली होंगी जाने से पहले …
अब कुछ बाक़ी नहीं रहा हमारे बीच
लगता है
पहले भी कभी कुछ नहीं था ....... !!!