तुम्हारे सपनों से लदी
मेरी पलकें
बोझिल हो चुकीं है अब
फिर भी पत्थरों से
कुछ नहीं कहा मैंने .
सुना है पत्थरों को चिनवाते हैं
मकानों में
और उन मकानों में रहने वालों का
कोई सपना बचता ही नहीं .....
खिड़की -दरवाजों के रंगों में
उलझे वे लोग
बाहर के आसमान का सिन्दूरी होता रंग
और बादलों की चाँद से लुका छिपी का
संगीत समझ ही नहीं पाते !!!
मैंने अब तक सारा संगीत भी
तुम्हें नहीं दिया है
बाकी बची तोहमतों के बदले
रेत के समंदर पर
अपने ख्वाब बिखेर दूँगी ,
तुमसे किये तमाम वादे भी पूरे
नहीं करुँगी मैं ....
अधूरी ख्वाहिशों से जनमती हैं गुजारिशें .
मुझे चाहिए वो सब
जो बाकी है ....!!!
तभी ये बोझिल पलकें
गुम हो पाएंगी
उस अँधेरे सूरज की रौशनी में
जिसमें अब कोई
सपने नहीं देखता ..........!!!
मेरी पलकें
बोझिल हो चुकीं है अब
फिर भी पत्थरों से
कुछ नहीं कहा मैंने .
सुना है पत्थरों को चिनवाते हैं
मकानों में
और उन मकानों में रहने वालों का
कोई सपना बचता ही नहीं .....
खिड़की -दरवाजों के रंगों में
उलझे वे लोग
बाहर के आसमान का सिन्दूरी होता रंग
और बादलों की चाँद से लुका छिपी का
संगीत समझ ही नहीं पाते !!!
मैंने अब तक सारा संगीत भी
तुम्हें नहीं दिया है
बाकी बची तोहमतों के बदले
रेत के समंदर पर
अपने ख्वाब बिखेर दूँगी ,
तुमसे किये तमाम वादे भी पूरे
नहीं करुँगी मैं ....
अधूरी ख्वाहिशों से जनमती हैं गुजारिशें .
मुझे चाहिए वो सब
जो बाकी है ....!!!
तभी ये बोझिल पलकें
गुम हो पाएंगी
उस अँधेरे सूरज की रौशनी में
जिसमें अब कोई
सपने नहीं देखता ..........!!!
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