Sunday, 27 July 2014

हर जाने अनजाने शख्स की तलाश की मैंने 
मगर सिर्फ खुद को ही पाया वहां 
तमाम पगडंडियाँ भर चुकी थीं 
झाड़ियों से 
और मेरे पैरों के निशानों का 
भ्रम भी नहीं था कहीं भी -
मालूम है अन्तरिक्ष में बसने लगे हैं लोग 
और परियों से दोस्ताना भी है मेरा 
पर यूँ इस तरह गुमशुदा नहीं हुआ जाता! !
मुझे लगा था मैंने ही वह शहर छोड़ा है .....मगर ....
दरअसल 
वह शहर ही मुझे छोड़ गया कभी का .......!!!

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