न जाने क्यूँ अब कलम से ज़्यादा
ज़ुबान चलने लगी है
कागज़ के पुलिंदों की तो कतरनें बना कर
आग के हवाले कर देते हो
अब ज़हर बुझे बोलों को कहाँ दफ़नाओगे ???
ज़ुबान चलने लगी है
कागज़ के पुलिंदों की तो कतरनें बना कर
आग के हवाले कर देते हो
अब ज़हर बुझे बोलों को कहाँ दफ़नाओगे ???
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