Monday, 25 August 2014

टूट कर चिंदी चिंदी हुए शख़्स की
तमाम सिसकियाँ समेट लीं मैंने …
अब धरती के पार ,चाँद सितारों से परे
उड़ता फिरेगा वह ,
उसकी मुस्कराहटें फिसल कर
आकाशगंगाओं से जा मिलेंगीं
तब -
टिमटिमाते नक्षत्रों से बरसेंगीं
कुछ ज़्यादा रोशनियाँ…!

मैं पहले की तरह उसको ताकूंगी
ज़मीन से पत्थर चुनती
या हथेलियों में धूप बाँधती ,
कभी कभी प्यासे पडे
झरनों के बंधन खोल कर
दो -चार बूँदें उसकी ओर उछालती
(जाने कहीं धरती के अंतिम छोर तक
पहुँचने की जल्दी में प्यासा न रह गया हो .. )

मैं जानती हूँ वह दूर तक उड़ेगा
देह से जनी तमाम पीड़ाएँ तो
यहीं छोड़ गया है
मेरे आस -पास....... !!!

  

Monday, 11 August 2014

ज़रूर कुछ कहा है इन बूंदों के कानों में तुमने
तपती हुई सी बरस रही हैं...
अब भी बाकी रह गया हो कुछ
तो कल का इंतज़ार करना
आज फ़र्क समझ लेने दो
फुहारों और आँसुओं का !
न जाने क्यूँ अब कलम से ज़्यादा
ज़ुबान चलने लगी है
कागज़ के पुलिंदों की तो कतरनें बना कर
आग के हवाले कर देते हो
अब ज़हर बुझे बोलों को कहाँ दफ़नाओगे ???