Tuesday, 18 November 2014

दर्द साझा किया तो आधा हो गया ...

Wednesday, 10 September 2014

ना जाने क्यूँ 
वो भी गलत होता गया 
जो सही था ...
वज़ह अब तक 
नतीजों के इंतज़ार में है ...!!!
हर कहानी में राजा रानी नहीं होते ...कुछ किस्से शुरू ही बेवफ़ाई से होते हैं ...!!!

Monday, 25 August 2014

टूट कर चिंदी चिंदी हुए शख़्स की
तमाम सिसकियाँ समेट लीं मैंने …
अब धरती के पार ,चाँद सितारों से परे
उड़ता फिरेगा वह ,
उसकी मुस्कराहटें फिसल कर
आकाशगंगाओं से जा मिलेंगीं
तब -
टिमटिमाते नक्षत्रों से बरसेंगीं
कुछ ज़्यादा रोशनियाँ…!

मैं पहले की तरह उसको ताकूंगी
ज़मीन से पत्थर चुनती
या हथेलियों में धूप बाँधती ,
कभी कभी प्यासे पडे
झरनों के बंधन खोल कर
दो -चार बूँदें उसकी ओर उछालती
(जाने कहीं धरती के अंतिम छोर तक
पहुँचने की जल्दी में प्यासा न रह गया हो .. )

मैं जानती हूँ वह दूर तक उड़ेगा
देह से जनी तमाम पीड़ाएँ तो
यहीं छोड़ गया है
मेरे आस -पास....... !!!

  

Monday, 11 August 2014

ज़रूर कुछ कहा है इन बूंदों के कानों में तुमने
तपती हुई सी बरस रही हैं...
अब भी बाकी रह गया हो कुछ
तो कल का इंतज़ार करना
आज फ़र्क समझ लेने दो
फुहारों और आँसुओं का !
न जाने क्यूँ अब कलम से ज़्यादा
ज़ुबान चलने लगी है
कागज़ के पुलिंदों की तो कतरनें बना कर
आग के हवाले कर देते हो
अब ज़हर बुझे बोलों को कहाँ दफ़नाओगे ???

Sunday, 27 July 2014

हर जाने अनजाने शख्स की तलाश की मैंने 
मगर सिर्फ खुद को ही पाया वहां 
तमाम पगडंडियाँ भर चुकी थीं 
झाड़ियों से 
और मेरे पैरों के निशानों का 
भ्रम भी नहीं था कहीं भी -
मालूम है अन्तरिक्ष में बसने लगे हैं लोग 
और परियों से दोस्ताना भी है मेरा 
पर यूँ इस तरह गुमशुदा नहीं हुआ जाता! !
मुझे लगा था मैंने ही वह शहर छोड़ा है .....मगर ....
दरअसल 
वह शहर ही मुझे छोड़ गया कभी का .......!!!
तुम्हारे सपनों से लदी 
मेरी पलकें 
बोझिल हो चुकीं है अब 
फिर भी पत्थरों से 
कुछ नहीं कहा मैंने .
सुना है पत्थरों को चिनवाते हैं 
मकानों में 
और उन मकानों में रहने वालों का 
कोई सपना बचता ही नहीं .....
खिड़की -दरवाजों के रंगों में 
उलझे वे लोग
बाहर के आसमान का सिन्दूरी होता रंग
और बादलों की चाँद से लुका छिपी का
संगीत समझ ही नहीं पाते !!!
मैंने अब तक सारा संगीत भी
तुम्हें नहीं दिया है
बाकी बची तोहमतों के बदले
रेत के समंदर पर
अपने ख्वाब बिखेर दूँगी ,
तुमसे किये तमाम वादे भी पूरे
नहीं करुँगी मैं ....
अधूरी ख्वाहिशों से जनमती हैं गुजारिशें .
मुझे चाहिए वो सब
जो बाकी है ....!!!
तभी ये बोझिल पलकें
गुम हो पाएंगी
उस अँधेरे सूरज की रौशनी में
जिसमें अब कोई
सपने नहीं देखता ..........!!!

Saturday, 12 July 2014

कागज़ की तरह तुड़े मुड़े अहसासों को
हथेली से सपाट करके
तहा  कर रखा एक कोने में
ऐश ट्रे तुम्हारे पुराने जुराबों में ढूंस कर
सरका दी है दुछत्ती पे
यहाँ वहां बिखरे डियो के कैन
कल ही कबाड़ी को दिए
एक दो बिना रिफिल के पैन थे
और कुछ फाइल कवर्स भी
सब डस्ट बिन को नज़र किये।
दराज़ में दिखी नहीं तुम्हारी
बकवास गानों वाली सी डीज़ और पेन ड्राइव्स
शायद समेट ली होंगी जाने से पहले …
अब कुछ बाक़ी नहीं रहा हमारे बीच
लगता है
पहले भी कभी कुछ नहीं था ....... !!!

Saturday, 14 June 2014

ये शहर शिनाख़्त नहीं करता किसी की ---!
तमाम तर्ज़नियाँ थक जातीं हैं दिशा बताते बताते ,
धुंध बादल बनने से पहले ही छितरा जाती है ,
सड़कें सरकती सी पहुँचातीं हैं गंतव्य तक ,
और -
ख़ुश्क मिजाज़ लोग तलाशते हैं रिश्तों में नमी … !
सुनो -
बारिशें छोड़े जा रही हूँ तुम्हारे तमतमाते शहर में !!!
थामे रखना दो बूँदें अपनी पसीजती हथेली में
कलम के साथ साथ…
अगली बार भीगती भिगोती आऊँगी
सावन के हरेपन में सौंधी महक बिखेरने
तब खोल देना अपनी बंद मुठ्ठी
और बहा देना ये दो बूँदें
बरसती बौछारों की गोद  में !
चाहो तो चख लेना उन्हें
बहुत खारी-सी लगेंगी …
आखिर तुम्हारी कलम से निकला तमाम नमक
समंदर तक थोड़े ही पहुँचता है !!!!

Monday, 2 June 2014

सुनो 
मेरे जाने के बाद 
मेरी खामियों को कहकहे न बनने देना तुम ...
तहा कर रख देना उन्हें 
अपने शहर के उस कोने वाली इमारत के तले 
जिसे तुम मंदिर कहने से 
हमेशा कतराते हो ।
हो सकता है 
वक़्त गुज़रने पर तुम्हें लगने लगे 
कि उम्र भर खामोश रहने से बेहतर है 
उस जगह जा कर 
शाम ढले कुछ देर घंटियाँ बजा दी जाएँ ...
यकीन मानो 
लोगों के क़हक़हों से सुरीली लगने लगेंगी 
ये आवाज़ें तुम्हें ...
और एक दिन -
तुम खुद से किया वादा तोड़कर 
वहाँ सर झुका लोगे ..... ।
बस ,मेरे जाने के बाद इतना भर करना तुम !!!!

Thursday, 29 May 2014

मन हुआ परिंदा
शाख के सुर्ख पत्तों में बसाया
सुनहरा घरौंदा अब कहीं आबाद हुआ ।
अब देखना रोज़ समेटेगा
तुम्हारी प्रीत के तिनके
और
चहचहाएगा उम्र के आख़िरी पड़ाव तक ....!
तमाम दर्द रोज़ एक बादल  बन
आसमान में टंग जाते हैं
उम्मीद है सावन में इस बार
खारा पानी ही बरसेगा …… !!!
 सुना है आजकल  चाँद  से  नूर नहीं 
अधजली ख़्वाहिशें  बरसतीं हैं 
पिछली बार मेरे ख़त फूँकते वक़्त 
आँधियाँ गुज़रीं थीं तुम्हारे शहर से …!

Wednesday, 21 May 2014

खुदा से मांगी किसी दुआ का असर है शायद !
बंद आँखों में और भी करीब नजर आते हो तुम !!!

Saturday, 17 May 2014

पीली कनेर सी मुस्कराहट
तुम्हारा हाथ थामते ही आग हो गयी थी
और धुँआ हो गए थे वे तीन शब्द -
जो मेरी जुबाँ से तुम्हारे कानों तक
पहुंचे भी न थे ..... !
सुनो
वक़्त और तारीखें अक्सर मुझे याद रहते हैं
तारीखों पर जमी बर्फ पिघलने पर
लम्हों की तितलियाँ नींद से जाग जाती हैं
 और
वो तमाम ख़्वाहिशें,जो डुबो दी थीं मैंने
झील की गहराई में -
फिर से तैरने लगतीं हैं किनारे की ओर बेतहाशा
देखते ही तुम्हारा अक़्स कहीं आस पास ……
यक़ीनन
वक़्त गुजरने पर उगने लगेंगे वो नीले फूल भी
जिनके रंग उड़ कर कभी
आसमान बन गए थे
देखना -
आज उन तितलियों के पंखों से बनेगा
मेरे और तुम्हारे शहर के बीच एक इन्द्रधनुष
जिसमें घुल कर कल का सूरज
कुछ ज्यादा ही सुनहरा हो जायेगा !!!

Sunday, 27 April 2014

  • कैसे लिख दूँ माँ पर कविता? यूँ ही जैसे लिखती हूँ सूरज चाँद की रौशनी पर या फिर समंदर की गहराई पर? अक्सर लिखा है प्रेम के अदभुत रंगों पर और नफरत की शिद्दतों पर भी - अब कलम ही नहीं चलती दूध के क़र्ज़ या आँचल की छाँव , लोरी की गुनगुनाहट या गोद की गर्माहट जैसे लफ्जों पर! कैसे लिख दूँ उन तमाम आशीर्वचनों पर जिनके कवच सरीखे अहसास कितना महफूज़ महसूस कराते हैं . उन आंसुओं तले धुंधली होती नज़र को कौनसे शब्दों का जामा पहनाऊं जो वक़्त-बेवक्त की तकलीफों में मेरे हिस्से का दर्द भी तुमसे साझा कर लेती हैं? कैसे लिख दूँ माँ की कंपकपाती हथेलियों की इबारत , जिनमें समाई कोमलता अक्सर अब भी सिरहाने पसर जाती है और रूह को ठंडक भरी तसल्ली दे जाती है ... समय की सिरहन से गीला होता मन न जाने क्यूँ उँगलियों का सहारा नहीं बन पाता फिर भला कैसे संभव है मेरे और माँ के बीच सिर्फ एक कविता का सम्बन्ध?????

Monday, 21 April 2014

मैंने वो हरेक लफ़्ज सुना है 
जो तुमने कभी कहा ही नहीं -
दरअसल मैं अक्सर वही सब सुन पाती हूँ 
जो तुम्हारी रूह के इर्द गिर्द नागफनी सा उगा रहता है 
कई बार उस आवाज़ से उलझ कर 
मेरी बेबसी के टुकड़े टुकड़े हुये हैं 
और अनसुनी कराहों की अनगिनत मौतें हुईं हैं ....

मैं हर दिन आसमान का भटकना 
और शीशों का टूटना महसूस करती हूँ 
लेकिन हार जीत के खिलाफ 
उलटते पासों की सरगोशियाँ
अब तक मेरी बर्दाश्त के बाहर है ...
हाँ ,वक़्त आने पर मेरे गीतों की खामोश धुनें 
तुम्हारी समझ के घेरे में आ ही जाएंगी 
पर तब तक तुम्हारी आँखों का रंग 
लाल से सफ़ेद हो चुका होगा ...!

मैं जानती हूँ कि अनसुना रह जाना 
कितना तकलीफ देता है !
लेकिन किस्मत की लकीरें बदलने के लिए 
पत्थरों का नुकीला होना ज़रूरी नहीं -
दुनिया भर  के तमाम अहसासों के साथ 
यह महसूसना भी उतना ही सुकून देता है 
कि हार जीत की धूप छांव से परे उग रही 
वक़्त की नन्ही कोंपलों को
मेरे माथे की चमक से सहलाना 
उनके दरख्त बन जाने तक उतना ही ज़रूरी है 
जितना ज़रूरी तुम्हारे लिए
भीड़ में अकेला होना है ....!!!!!

Saturday, 8 March 2014

देखना इस बार फागुन में मछलियाँ सुनहरी होकर गुलाबी फूलों का पता पूछेंगी और परिंदे आसमानी हो जाएंगे - झील के हरेपन में पर्वतों का रंग गड्डमड्ड हो जाएगा और पत्थरों का सुर्ख रंग गुलमोहर उधार माँगेगा - नीली पगडंडियाँ कुदरती बसंती होकर महकेंगी जहां दो चार भूरे- पीले फरिश्ते तुमसे सवाल जवाब करते नज़र आएंगे - बैंगनी दरख्तों से गुनगुनाने की मनुहार मत करना ,
वहाँ बूढ़े होते तनों में छिपा कर रखीं सलेटी यादें अब तक काली पड़ गईं होंगी ! सुनो - मैं इस बार फागुन में सफ़ेद दुपट्टा ओढ़े निकलूंगी और देखना - फिर भी बेरंग बेदाग ही वापस आ जाऊँगी सिर से पाँव तक सिर्फ तुम्हारी प्रीत के रंग में रंगने को !!!
तुम्हारे उलाहने वक़्त रहते अकेले पड़ जाएंगे ...देखना अब चाँद की नज़र ...मुझे देखती तुम्हारी ...निगाहों से ना हटेगी ....!!!
दफनाये हुये जिस्म चुप नहीं रहते ...एक खामोश जिंदगी बिताने के बाद ...!अक्सर दबी सी गुफ़्तगू होती है उनकी खाक में मिले अरमानों से !!!!

Monday, 24 February 2014

बहुत से रंग भाने लगे हैं
अब मैं सफ़ेद दुपट्टा नहीं ओढ़ती
सच है
जब मन बसंती हो तो
मौसम का कुछ भी कहना सुहाता है ....!
सुनो
आज मैं बहुत भीगी
भीतर से भी
बाहर से भी -
ज़रूर बादलों से मिल
साजिश रची होगी तुमने !
कुदरत के करामाती नज़ारों में
अनगढ़ शिला से ....
शिव हो तुम मेरी तीसरी दृष्टि में ,
बांध लो मुझे -
गंगा सा !!!!!

Saturday, 22 February 2014

 इंतज़ार ही तक़दीर है उस बंजर की ...फख्र जो हवा में उड़ते बादलों पे करे ......रेत में घुले चश्म ...भला बूंद बन कब बरसे हैं ...!!

Monday, 17 February 2014

आजकल दुआएं आसमान से नहीं बरसतीं
यूं ही रीता रीता सा रहता है
उम्मीदों का मन ,
और उपेक्षा की खुश्क हवाएँ
थपेड़े दिये जाती हैं ।
कहीं छिप के जलते हैं कुछ ख्वाब अधूरे 
यकीनन कागज़ में लिखे वादे
अब तक मिट कर
धुआँ धुआँ हो गए होंगे ....!!


Monday, 10 February 2014

न जाने मेरी कलम की स्याही से 
कोई और तस्वीर बनती ही नहीं .....
तमाम कागजों का जी 
यूँ ही रोज़ रोज़ जलता है ,,,,,,!!!!
कैसे जी लेते हो यूँ नीलकंठ बन के तुम ?
एक बार उगल दो ये सारा ज़हर .....
क्या हुआ जो बसंत नीला हो जायेगा !!!
और सुनो ,
मेरे लिए मौसमों की फेहरिस्त 
इतनी लम्बी नहीं-
पतझड़ के बाद कोई मौसम 
आता ही नहीं .......!
अब तो पलकों ने भी बगावत कर दी है .....
तुम मिलो तो कुछ कतरे टपकेंगे !!!

Sunday, 9 February 2014

 रेत के प्यालों में छुपा के रखती है वो 
अपने तमाम नम हुये ख्वाबों को ...
देखना एक रोज़ ...तुमसे मुलाक़ात का सूरज 
सोख लेगा प्यास की गठरी ...
और तब बिखर जाएगी 
दहलीज़ पर चाँदनी ही चाँदनी ......!!!!
निहायत सलीके से तहा  कर रखी तमाम शिकायतें
मनुहार के एक झोंके से
तितर बितर कर दीं तुमने -
लम्हा दर लम्हा फूलों का रंग नीला न पड़ जाये
ज़रा देखना …
ये बसंत अब…पीला न रहेगा !!!! 

Friday, 10 January 2014

वो एक शख्स
जो बाँटता है ज़माने भर को खुशियाँ
उसे अपने ज़ख्म गिनने का वक़्त नहीं …
 उन दिनों  बंद खिड़की को बेध कर
दो निगाहें  चला करतीँ थीं उसकी पीठ तले
तब वक़्त नापने की फुर्सत कहाँ थी ?
अब -
प्रेम का विश्लेषण वो  करे या मैं …
नतीज़ा ख़ुशी- ग़म से परे
उँगलियों के पोरों तलक ही
सिमट आया है बस ……!!!