Thursday, 29 December 2011

बुहार लेने दो मुझे



बुहार लेने दो मुझे 
राहों से तुम्हारे 
वो दो चार कांटे ,
कुछ बूंदें दर्द क़ी,
बिखरे ख्वाबों क़ी किरचें 
और पीडाओं के कंकर .
जानती हूँ कहोगे कि
प्रेम में सब यही करते हैं ....
यही सुलगते से सवाल 
मीलों की दूरी पार कर 
जवाब की तलाश में 
मेरे शहर के रास्तों पर 
बंजारे से भटकते हैं ,
झीलें इंतजार में हैं अब भी 
उस बोतल के बहकर आने के 
जिसमें तुमने मेरे नाम का 
एक कागज़ रख कर छोड़ा था ...
तुम्हारी और मेरी हथेलियों के बीच 
उगता हुआ दरख़्त 
अब सबको दिखाई देता है 
उसकी हरी शाखों से छनकर
तुम्हारे नीले सूरज की किरणें 
मेरे पैरों के नाखूनों को सहला रही हैं .
सुख दुःख बाँटने का प्रयास 
सभी करते हैं प्रेम में 
परन्तु चारों तरफ छाये 
कोहरे को चीर कर 
जब तब तुम्हारे दर्द के जंगल 
उग आते हैं मेरी राहों के बीचों बीच ...
बुहार लेने दो मुझे वो सब कांटे 
क्योंकि न जाने कब तुम 
हवा और धुंध का 
फर्क समझ पाओगे ......?

Saturday, 17 December 2011



उल्टे पाँव चलते हुए लौटना 
उतना आसान नहीं होता होगा 
चौकोर से दिनों की  तिकोनी धूप 
और आयताकार रात के गोल सितारे -
सबको उलट कर भी वही सतरंगी ओढनी
नहीं बनाई जा सकती 
फिर फिर उधड जाती है 
तीखे तानों क़ी सिलाई -
और बार बार बिखर जाता है 
सपाट से चेहरों पर व्यंग का रंग -
कितनी ज़द्दो-ज़हद होती होगी 
फटने से पहले बम के नन्हे नन्हे परमाणुओं में 
और तब -
कितना सुकून देता होगा 
प्रेम का नफरत में बदल जाना ......

Saturday, 19 November 2011

कुछ कहे बिना



कुछ कहे बिना 
समझते समझते 
आखिरी सन्नाटे ने भी 
मुंह फेर लिया ,
सारा मौन मिल कर 
चीखने लगा और
शोर में दबी सिसकियों ने
घर छोड़ने से पहले
पता भी न पूछा मेरे मोहल्ले का ....
अब भी उन चुप्पियों का तीखापन
हवा में घुल कर
तलाश रहा है
मेरे मन के कोनों में छिपी
सीली सीली सी सुलगन को -
जलाने या बुझाने के लिए ....

Thursday, 17 November 2011



मैं उस दिन का इंतजार करुँगी 
जब तुम्हारी हथेलियों से छन कर आती धूप 
उतरेगी मेरे चेहरे पर 
और उनींदी आंखे खोलने पर 
देखूंगी तुम्हारे भीगे बालों से टपकती बूंदों को .

हो सकता है तब तक 
तुम इतने बदल जाओ 
कि नाम तक भुला दो मेरा 
और पूछो अचकचा कर 
कौन हो तुम ???

तब में अगले पिछले सारे वादों की
ओढ़नी समेट कर रख दूँगी 
और फिर से तुम्हारे प्रश्नों के उत्तर 
एक झीने से आवरण में बुन कर 
इस तरह डाल दूँगी तुम्हारे अनमने भावों पर 
कि तुम उनकी पारदर्शिता में 
कुछ न छिपा पाओगे मुझसे ...

कौन नहीं जानता कि बादल, हवा जरुरी है सबके लिए ?
रेत में बनते -बिगड़ते आकारों को
 हमेशा गिनते रहना बेमकसद है ?
या पेड़ पर लगे पत्ते झरने से पहले 
ज़रा-सा कंपकपाते हैं ?

फिर भी इन सवालों के घिसे -पिटे जवाब 
मिलेंगे तुम्हें बार बार 
लगातार !
इसलिए नहीं कि मेरे उत्तर 
तुम्हारे अनमनेपन को बेगाना कर देंगे -
बल्कि इसलिए कि 
तुहारे प्रश्नों के जुड़ने -घटने से ही 
मैं अपनी ज़िन्दगी के गणित के सारे प्रमेय 
सरलता से समझ पाती हूँ ........

Friday, 11 November 2011

चाहे जो भी हो



जी चाहता है किसी दिन 
तुम्हारे दिलो -दिमाग में भरा 
सारा ज़हर निकाल कर 
बिखेर दूँ अपनी छत पर .
धूप उतरेगी 
तपाएगी उसे ,
फिर शायद भाप -सा 
घुल जाये हवा में ....
रेत के गुबारों से अट जाएँगी 
मुहल्ले क़ी सड़कें ,
बौछारें सक्पकायेंगी
मेरी गली में बरसने से ,
तीखी चुभन से कस्मासयेंगे 
सारे दरख़्त ,
और ज़हरीली तपन से झुलसेंगे 
पंछी -पौधे .....
चाहे जो भी हो -
भुलाना होगा हर हाल में 
उन गर्म हवाओं को 
मेरे शहर से
तुम्हारे दिलो -दिमाग तक का रास्ता !!!!!!

Monday, 7 November 2011

यूँ ही लिखते रहो तुम


यूँ ही लिखते रहो तुम 
बसंती से इस मौसम में 
अपनी प्रेम कवितायेँ 
जो शब्द छंदों की परिधि माने बगैर 
डूबती उतरती रहती है 
संबंधों की उन्मुक्त नदी में 
तपा जाती हैं 
देह और मन दोनों को ही 
गुनगुनी धूप -सी 
और बावरा सा मन 
न जीता है न मरता ......
        नन्हा सा सुख 
       स्मृतियों में  भी छिपा होता है 
        जो हवा की गंध समेटे 
        उतर जाता है आत्मा तक
        नदियों की धार पर 
       पक्षियों की चोंच सा 
       संगीत देता हुआ ......
तुम लिखते रहो यूँ ही 
चाह कर भी न टूटेंगी कुछ खामोशियाँ 
जो दबा रखी हैं उन तमाम मौसमों ने 
अपनी कटोरा भर हँसी के बोझ तले
जो रह रह कर 
जल तरंग सा बजा जाते हैं 
बगैर ये जाने क़ि तुम उन्हें 
अनुशासित करने की बात कहते हुए 
भूल जाते हो उनमे पहले
जीवन फूंकना ......

Wednesday, 2 November 2011

तुम्हारे जाने के बाद ..........

तुम्हारे जाने के बाद 
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जब तुम मिलने आओ 
तो पूरब की हवा की सारी
नमी लेते आना 
जिसे मैं अपनी
झीलों के किनारे छोड़ दूंगी 
और हमारे शहर का हर कोना 
तुम्हारी गंगा सा पवित्र हो जायेगा .
      तुम चाहो तो चाँद सितारे सी 
      वो बिंदिया भी लेते आना 
      जो सड़क पार वाली उस दुकान पर
     मैं यूँ ही छोड़ आई थी चलते चलते 
     जबकि मैं जानती थी कि
     वो मेरे माथे को सूरज बना देगी  .
लाना चाहो तो अपने घर के 
पिछवाड़े के कोने में थमी 
वो धूप भी लेते आना 
जिसमें अक्सर तुम्हारी गिलहरी 
सुस्ताया करती थी 
जाड़े के दिनों में  .
       यूँ तो बादल की वह चादर भी 
      अब तक वहीँ सूख रही होगी 
      तुम्हारी छत की अलगनी पर 
     जिसमें सफ़ेद रंग के धुंधले से 
      फूल काढने लगी थी मैं 
      और तुमने कहा था 
     इसे हरा बना दो  .
आते हुए  माँ के हाथों की 
खुशबू भी समां लाना 
अपने लापरवाह से बालों में 
जिनमें सिरदर्द का बहाना करके 
तुम बार बार तेल लगवाते थे 
और मैं तकिये के गिलाफ को 
गर्म पानी में डुबोना 
भूल जाया करती थी .
       अगर ये सब कुछ तुम न भी लाओ 
       तो ऐसा कुछ नहीं होगा 
       तुम्हारे आने पर 
      कि तुम फिर कभी न आने का 
       वादा कर सको 
      मेरी झीलें ,मेरी बिंदिया ,
      मेरी धूप ,मेरी धड़कन -
     कुछ भी नहीं बदलेगा .
     ये सब कुछ हमेशा बदलता है 
      सिर्फ तुम्हारे जाने के बाद ..........


Monday, 31 October 2011

विकल्प



तुमने कहा तुम बरसोगे
और मैं अंजुरी बन गयी
तुमने कहा तुम बिखरोगे
मैं आँचल सी बिछ गयी
अब तुम चाहते हो आस्मां से गिरना
पर मैं खजूर नहीं बनूँगी तुम्हारे लिए
कभी नहीं -
गले लगाना मेरी नियति है
गिरना तुम्हारा स्वाभाव
क्या कोई विकल्प है मेरे पास ?

Wednesday, 28 September 2011

हर बार

जब जब भी खाली करते हो तुम
अपनी चुप्पियों से भरा झोला मेरे सामने
चुन लेती हूँ मैं उनमें से
सारे ताने ,उलाहने और शिकायतें
अपने हिस्से की -
फिर भी बची रह जाती है
धीमी धीमी सांसे लेती
उलझनों और संदेहों की
एक छोटी सी पोटली .
यही होता आया है अक्सर
आज भी रह गयी वह पोटली
और तुमने फिर से उसे
अपने झोले में डाल लिया ...
जानती हूँ अगली बार फिर उँडेल दोगे
उसे मेरे सामने
कुछ नए तानों उलाहनों के साथ
और फिर उस बोझिल होती पोटली को
यूँ ही छोड़ कर चल दोगे तुम
मैं तुम्हारे चेहरे पर अधखिले फूल सी मुस्कराहट
देखने के लिए फिर से चुन लूंगी
उन सारी शिकायतों को
और तुम्हारी चुप्पियाँ
बनती रहेंगी जानलेवा
हर बार ........

Sunday, 28 August 2011

दर्द



जाने क्यूँ आधा-अधूरा सा दर्द ही 
आता है मेरे हिस्से में ?
बाकी किसे बाँट आते हो?
तलाशा मैंने  उसे 
तुम्हारी किताबों और दराजों में 
तुम्हारी नज्मों की 
अलिखित पंक्तियों में भी 
बंद खिड़की की दरारों से झांकती 
रौशनी की लकीरों में 
यहाँ तक कि
होठों तक आ कर रुक गए 
तुम्हारे अनकहे शब्दों में भी ---
कहीं नहीं मिला ,
कभी नहीं मिला -
हथेली के नम हो जाने तक 
लिखते रहे तुम 
उन सभी दर्दों को 
कभी ग़ज़ल ,कभी कविता 
तो कभी गीत बनकर 
बिखेरते रहे चारों तरफ --
एक कतरा भर बच गया होगा 
लिखने से 
वही पहुंचा मुझ तक 
आधा अधूरा सा दर्द ...
इसे कैसे करूँ पूरा 
कि वापस न जा पाए तुम तक 
मेरा ही हो कर रह जाये 
यह भरा पूरा सा दर्द 
और रह जाये तुम्हारे आस -पास 
बिना किसी दर्द के जीने का अहसास 
हमेशा -हमेशा ..........

Saturday, 9 July 2011

तलाश


समंदर की लहरों से टकराते 
विचारों के भंवर 
फटती मस्तिष्क की शिराएँ 
और 
उफनते भावनाओं के ज्वार--
तलाशो !
कहीं तो होगा 
निष्कासन का एक छिद्र 
जो संभव कर सके 
द्रवित संवेदनाओ का बहाव 
मनुष्य से मनुष्य की ओर ............!

Sunday, 3 July 2011



दूर तलक आ गयी हूँ संग तुम्हारे 
इतना -कि पीछे मुड़ कर देखूं तो 
सलेटी सा धुंआ नज़र आता है चारों ओर 
और सामने देखने की कोई वज़ह नहीं होती 
चाहती हूँ सिर्फ तुम्हारा साथ 
न आगे की राह का आभास 
न पीछे की पगडण्डी से वास्ता .
     अचानक सरका लेते हो तुम 
     आहिस्ता से अपना हाथ 
     मेरी हथेलियों के बीच से
     तितली के परों का सा 
     नर्म अहसास दिलाते हुए ,
     मैं विचर रही हूँ 
     संग -साथ की स्मृतियों की वाटिका में 
     परन्तु -
     मेरे स्वप्नों को यथार्थ से टकराते ,
     टूट कर चूर होते हुए भी 
    न देखा तुमने 
     और उजाड़ दी 
     भविष्य की कोख में पलती 
     मेरी आशाओं की फुलवारी 
     बेआवाज़ ....... 

Saturday, 2 July 2011

तुमसे मिलना

                      
जब भी चिलचिलाती धूप से बचने को 
फैलाओगे अपनी हथेलियाँ 
मुझे पाओगे अपनी अँगुलियों के 
पोरों के बीच में .
अपनी आँखों को भिगोना 
पानी के छींटों से और 
महसूस करना उन बूंदों को 
अपने चेहरे पर 
जिन्हें मैं यूँ ही बहता छोड़ आयी थी .
        हवा के झ्होंकों की अंगुली पकड़ कर 
        रास्ते बनाये थे मैंने 
        बादलों के गुस्से से बेपरवाह 
       भीगते हुए 
        तितलियों के पीछे पीछे भागी थी 
       कुछ दूर चल लेना वहां तक 
       बेमकसद ...
अगली बार तलाशुंगी
 तुम्हारे क़दमों के निशान 
उस झ्हरने के पास ,
पहाड़ की तलहटी में 
और जंगल के दरख्तों के बीच 
जहाँ रुक कर तुमने कुछ देर 
ताज़ी हवा भरी होगी अपनी सांसों में 
और लिया होगा मेरा नाम 
कई बार अपने होठों से ...
        लगता है हम यूँ ही मिलते रहेंगे 
        इन वादियों में हमेशा 
        एक साथ नहीं-
         एक के बाद एक 
        जुदा जुदा सा होगा ये मिलना 
        तुमसे तुम्हारे बाद----

Sunday, 26 June 2011

दर्द का रिश्ता



तुम्हारे परोसे हुए दर्दों में से
कुछ निवाले मैं ले आई हूँ अपने साथ
न जाने कितने नामों की परछाइयाँ 
पीछे खिंची  चली आई
जिनमे से कुछ को तो मैं
पहचानती भी नहीं
     तुमसे रहा होगा कुछ रिश्ता उनका
    तभी तो अपने  से लगे वे मुझे भी
    दर्द का रिश्ता
   ऐसा ही होता होगा शायद ......

Tuesday, 7 June 2011

मौन

   
पनपते विश्वासों के
अंकुरों की खेती पर ,
होता है तुषारापात .
यह  अँधेरा
हर बार अलग ढंग से
तोड़ता रहा मन
कैसे दूँ शब्द उन सपनों को ?
इसलिये मौन हूँ ....

Tuesday, 31 May 2011

टूटते सम्बन्ध



नई कोंपल की तरह
उगते ,फलते ,फूलते
नए सम्बन्ध
एकाएक झर जाते हैं
सूखे पत्तों की तरह .
     किन्तु मेरे और तुम्हारे सम्बन्ध
     जो कभी उगे ,फले ,फूले थे
     सूख कर भी
     जुडे हुए हैं आज.
    टूटेंगे !क्योंकि ये सम्बन्ध हैं
    पर तुम शोक मत करना
    तुम तो शाख हो
    नई कोंपल उगेगी तुम पर
    सूखा पत्ता तो मैं हूँ
    जिसे उड़ा ले जाएगी हवा
    धूल से मिल कर
     दुःख की पाती लिख जाएगी .
फिर भी इंतजार है
हवा के झोंके का,
जो आये और तोड़ कर मुझे
दूर कर दे तुमसे
क्योंकि ,
सूख कर भी जुड़े रहने की पीड़ा से
टूट कर गिर जाने का दर्द
कहीं बहुत कम होता है ....

Sunday, 29 May 2011

किसे मालूम था


किसे मालूम था कि
तुम्हारे सूरज की किरणे
चाँद की चांदनी 
और हवाओं की खुशबुएँ 
जोड़ देंगी कुछ सफ़ेद कागज 
मेरे खामोश दिनों में 
जिन पर लिख कर
रात की स्याही से 
धीरे धीरे बना दूंगी मैं 
एक नया शब्दकोष ..
तुम्हारी आत्मा हवा के लिबास में 
चुपके से उसे पढ़ कर लौट जाएगी 
और 
तब तक मेरी देह 
देवालय बन जाएगी .........

Wednesday, 25 May 2011

तुम्हारी नदी में


तुम्हारी मछलियों से की थी बातें मैंने
बूंदों पर उडती
धारों पर चढ़ती उतरती रंगीन मछलियाँ
अद्भुत अनोखे अनगिनत  आकार वाली मछलियाँ ...
      कहा था मैंने कि रंग तो मुझमें भी समाये हैं
      लगभग सारे ही -
      पर न जाने क्यों
      एक दूसरे में
     गड्ड-मड्ड हुए रहते हैं
     तुम जैसी रंगत दे नहीं पाते मुझे
     बस ,भीतर ही भीतर
     टकराते रहते हैं एक -दूसरे से
     ठोस पथरीले टुकड़ों क़ी तरह
     क्या इसलिए क़ि उन्हें
     किसी की रोम -रोम की पुलक ने
     नहीं जन्मा है ?
तुम्हारी मछलियों ने जवाब दिया -
शायद तुम्हारे रंगों को
इंतज़ार है अभी भी
किसी की द्रव्यता का
जिसमे घुल मिल कर
वे कर सकें तुम्हारी रंगत को भी
हम जैसा ही ....

Tuesday, 24 May 2011

तुमने आशीष दिया -
"सूरज- सी चमको दमको 
सर्वत्र फैलाओ अपनी आभा"
मैं चकित हुई , प्रसन्न हुई 
कि उन्नत हुई तुम्हारी विचारधारा . 
परन्तु फिर -
जब भी चमकना चाहा,
दमकना चाहा , 
रोशन होना चाहा
तुमने कहा -
"अपनी सीमायें पहचानो 
धुरी से विचलित न होओ
रहो आस पास अपने घेरे के "
      ठीक हैं-
       पर , फिर मैं सूरज कहाँ हुई?
       मैं तो पृथ्वी -सी ही रही 
       सिर झुकाए घूमती चारो तरफ 
       तुम्हारे निर्णय मानती 
       मौसम के अनुसार बदलती 
       काली छायाओं को ग्रहण करती 
       फिर मैं सूरज कहाँ हुई ?
शायद- 
तुम्हारा आशीष ही गलत था 
या फिर -
तुम्हारा स्वयं सूरज बने रहना ही उचित था...
किसे मालूम था कि
तुम्हारे सूरज की किरणे
चाँद की चांदनी 
और हवाओं की खुशबुएँ 
जोड़ देंगी कुछ सफ़ेद कागज 
मेरे खामोश दिनों में 
जिन पर लिख कर
रात की स्याही से 
धीरे धीरे बना दूंगी मैं 
एक नया शब्दकोष ..
तुम्हारी आत्मा हवा के लिबास में 
चुपके से उसे पढ़ कर लौट जाएगी 
और 
तब तक मेरी देह 
देवालय बन जाएगी .........

Friday, 20 May 2011

तुम्हारा साथ 

कभी कभी तुम्हारा साथ वैसा ही होता है 
जैसे बारिश की बूंदों में नहाये 
पेड़ों का हरापन 
या आसमान में पंछियों की 
कतारों का तिरछापन .
     सब कुछ दूधिया सा ,
     कहीं कहीं नीला भी 
     कुछ ऐसा -
     जिसमें संदेहों के सारे सितारे 
     टूटकर बिखर जाएँ 
     और 
     इतने दूर तक छिटक जाएँ 
     कि हमारी तुम्हारी किसी भी 
     दुआ -बद्दुआ से 
     कभी लौट कर न आयें ....

Thursday, 19 May 2011


यंत्रणा 

पारस को छूकर 
सोना बन जाने की चाहत 
पनीली आँखों को समुंदर 
पीने की आदत 
झिरती बूंदों को अंजलि में 
समेटने की मशक्कत 
उफनती लहरों से पत्थर 
उठाने की हरकत 
शब्दों को छंदों से 
बतियाने की फुर्सत 
फटने से पहले बम के 
परमाणु की हालत 
विचित्र है समय की 
परखने की ताकत -- -- --
           अवसाद के अधरों पर 
           प्रणय का अल्प -विराम 
           असंभव को पाने में 
           संवेगों का कोहराम 
           लगता है -
           यंत्रणा का दौर अभी 
           थमा नहीं है 
           जो शेष है 
           अशेष  अभी बना नहीं है .

Wednesday, 4 May 2011

तुम चले आये

जब भी तह करके
रखा स्मृतियों को
अपने वजूद के पिछले कोनो में/ सरकाकर
ये सोच कर कि
अब नहीं बिखरुंगी -तुम चले आये
बार- बार लगातार धकेलती रही
हथेलियों से -  आँधियों को
पीछे की ओर
ये सोचकर कि
 अब नहीं बहुंगी -तुम चले आये
रात भर करती रही/ ओस की  बूंदों से बातें
सुखाती रही
तकिये के किनारे का गीलापन / सुबह की किरणों से
ये सोच कर कि
अब नहीं बरसुंगी -तुम चले आये
मुस्कुराहटों से सजाये अँधेरे
खिलखिलाती रही दुपहरी
झिलमिलाती शामों के बिखरे से मंजर को संवारा
ये सोचकर कि
अब नहीं बहलुंगी -तुम चले आये
बार- बार लगातार धकेलती रही
हथेलियों से - आँधियों को
पीछे की ओर
ये सोचकर कि
 अब नहीं बहुंगी -तुम चले आये

Saturday, 30 April 2011

एक ख्वाब पूरा होने को

चुप चुप से पलों में 
सांसों में समेट लेना 
हम जी जायेंगे बरसों की दूरी 
और नदी की रेत पर 
तुम्हारा नाम लिख कर पूछेंगे खुद से 
तुम इतने अच्छे क्यों हो?

Friday, 15 April 2011

मुट्ठियों में तुम

बहुत ढूँढने के बाद
मिल गए तुम मुझे 
अपनी हथेलियों के बीच 
मुश्किलों से टुकड़े टुकड़े जोड़ कर 
तुम्हारी तस्वीर बनाई
और फिर 
कस कर भींच लिया 
अपनी मुठ्ठियों को .....

Wednesday, 6 April 2011

बदल गयी थी न परिभाषा ?

बुनते ,उधेड़ते
उलझते ,सुलझते
बिखरते ,समेटते
यूँ ही गुजर जाता है
एक अहम् हिस्सा इस  जीवन का
और रख देते हो तुम प्रेम को
एक पुराने कोट के मानिंद
टांग कर अलमारी में
सबसे पीछे
कि जब कभी जरुरत होगी
तो निकाल लेंगे
मैं फिर भी
कास कर लपेट लेती हूँ
प्रेम कि उन बिखरी स्मृतियों  को
अपने चारों ओर
एक गरम शाल की तरह
और अब मुझे इन्तजार है उस पल का
जब शरद झोंकों से सिहरने पर
याद तो आएगा तुम्हे वो पुराना गरम कोट
पर जहमत न होगी तुमसे उससे निकलने की
तब
लपेट कर तुम्हे भी अपनी गरम शाल में
पूछूंगी ये प्रश्न
क्या प्रेम की परिभाषा 
बदल गयी थी?

Monday, 4 April 2011

अब तुम ही कहो ...

तुम्हे शायद मालूम नहीं
कि बहने से ज्यादा रिसने में
दर्द होता है
वर्ना तुम अपने अश्कों की
दुहाई नहीं देते
बल्कि गैरों के जख्मों पर
कोई सौगंध उठाते
बहना तो चांदनी है बादल है
सागर है
मगर रिसना ....



सूरज की आग /साँसों का ताप
धरती के अन्दर का लाल गरम लावा
सीने में दबी ख्वाहिश
हथेली पे खिंची कोई रेखा
होठों पर जलती मोमबत्ती है
अब तुम ही कहो
आँखों से झरती ओस की बूंदें
और होठों पर पिघल रही मोम में से
किसे पोंछ देना आसान है