उल्टे पाँव चलते हुए लौटना
उतना आसान नहीं होता होगा
चौकोर से दिनों की तिकोनी धूप
और आयताकार रात के गोल सितारे -
सबको उलट कर भी वही सतरंगी ओढनी
नहीं बनाई जा सकती
फिर फिर उधड जाती है
तीखे तानों क़ी सिलाई -
और बार बार बिखर जाता है
सपाट से चेहरों पर व्यंग का रंग -
कितनी ज़द्दो-ज़हद होती होगी
फटने से पहले बम के नन्हे नन्हे परमाणुओं में
और तब -
कितना सुकून देता होगा
प्रेम का नफरत में बदल जाना ......

Sach mein man ke sare kone pal bhar mein ek ho gaye.....
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