Thursday, 29 December 2011

बुहार लेने दो मुझे



बुहार लेने दो मुझे 
राहों से तुम्हारे 
वो दो चार कांटे ,
कुछ बूंदें दर्द क़ी,
बिखरे ख्वाबों क़ी किरचें 
और पीडाओं के कंकर .
जानती हूँ कहोगे कि
प्रेम में सब यही करते हैं ....
यही सुलगते से सवाल 
मीलों की दूरी पार कर 
जवाब की तलाश में 
मेरे शहर के रास्तों पर 
बंजारे से भटकते हैं ,
झीलें इंतजार में हैं अब भी 
उस बोतल के बहकर आने के 
जिसमें तुमने मेरे नाम का 
एक कागज़ रख कर छोड़ा था ...
तुम्हारी और मेरी हथेलियों के बीच 
उगता हुआ दरख़्त 
अब सबको दिखाई देता है 
उसकी हरी शाखों से छनकर
तुम्हारे नीले सूरज की किरणें 
मेरे पैरों के नाखूनों को सहला रही हैं .
सुख दुःख बाँटने का प्रयास 
सभी करते हैं प्रेम में 
परन्तु चारों तरफ छाये 
कोहरे को चीर कर 
जब तब तुम्हारे दर्द के जंगल 
उग आते हैं मेरी राहों के बीचों बीच ...
बुहार लेने दो मुझे वो सब कांटे 
क्योंकि न जाने कब तुम 
हवा और धुंध का 
फर्क समझ पाओगे ......?

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