Monday, 24 December 2012
चुप रहो क्यूंकि शब्द नश्तर हैं तुम्हारे
अब भी चुभन बह रही है नसों में .
आसमान का नीले से लाल हो जाना
जरूरी नहीं रोज़ की एक आदत हो ....
सुबह का अवसाद रातों रात पैदा नहीं होता
और चुप रहने से अकेलेपन की तौहीन हो
ये भी कतई जरूरी नहीं .....
कभी कभी सौ चुप्पियों को एक मामूली नज़र ही
तबाह कर देती है
तो कभी सैंकड़ों आवाज़ों का शोर भी
तमाम सन्नाटों पे पहरे नहीं लगा पाता ...
बेहतर है अपने जवाबों के दायरे में
खुद ही सवालों से सवाल करते रहो ....
तुम्हारा ये सिलसिला ख़त्म होते ही
मौन से हुए मेरे तमाम अनुबंध
खुद ब खुद टूट जायेंगे !!!!
Tuesday, 20 November 2012
दो घूँट चाय
कुछ लोग बताते हैं भविष्य
चाय के कप के तले में बनी
सूखी,पुरानी आकृतियों को देख कर ...
बनाते हैं खूबसूरत कल की
चमकीली ,रंगीन,मनमोहक तस्वीरें ....
गढ़ते हैं उपाय
आने वाली तमाम मुसीबतों से
पिंड छुड़ाने के
और झटक लेते हैं
हमारी आज की मेहनत का
एक बड़ा हिस्सा .......!!!
मुझे भी दरकार है एक ऐसे ही किस्सागोई की
जो उधेड़ कर भविष्य के गर्त में दबी
तमाम उलझनों के फंदे -
सीधा सरल सा बुन दे
मेरे जीवन पथ का गलीचा ,
बेशक खुरदरा ही सही ---
बदले में माँग ले मुझसे
अपनी हसरत भर चाँद सितारे
और टंगा दे उन्हें किसी और के
चाय के कप की तलहटी में उभरे
अधबने आकारों पर ---
और वापस दे दे मुझे
मेरी दो घूँट चाय सी ज़िन्दगी .....!!!!
Thursday, 15 November 2012
जब सन्नाटों की चीखें गूंगी हो जाएँ
और खामोशियों की खेती करने का ख्याल सर उठाये ,
तब तक सहेजी हुई स्मृतियों का गीलापन
बार बार कडवे अहसासों को भिगोकर
अंकुरित कर देता है ...
और तमाम ख्यालों के हकीकत बनने तक
मौन की फसल लहलहा उठती है---!
उस आग के बारे में मत सोचो
न ही उस राख की बातें करो
जो कविता की तपिश को बाहर लाने की बजाय
भीतर ही भीतर सुलगता छोड़ देती है
और चंद फुहारों के इंतजार में
वह खुद को अर्थहीन बना देती है .....!
ऐसी बेमकसद कविताओं के गूंगेपन पर
कोई शर्मिंदा नहीं होता -
न ही किसी कविता को
एक खूबसूरत ग़ज़ल में तब्दील करने के लिए
अक्षरों को सहलाना, मनाना ज़रूरी होता है !
मैं जानती हूँ
उन ढेर सारे रंगों से मेरा अब कोई वास्ता नहीं
जिनके लिए हमेशा मेरी बिंदिया मुस्कराती थी ....
रंगों का खुद में सिमट कर
एक पीला मटमैला सा असर डालना
मेरी तबियत को अब
ज्यादा हरा कर देता है .......!!!!
Tuesday, 30 October 2012
पैबंद लगी जिंदगी .
टुकड़ों टुकड़ों में मिलती हैं खुशियाँ
और एक टुकड़े को दुसरे से जोड़ने में
लग जाते हैं
पीडाओं के अनगिनत धागे ....
नफरतों की तीखी सुई की चुभन से
छलक पड़ती हैं ऑंखें
और ज़ज्ब हो जाती है नमी
फिर से उन्ही टुकड़ों में ......
आसान नहीं है
एक भीगे टुकड़े को दूसरे तक पहुँचाना ,
एक कोना भी अटक जाये
तोहमतों के काँटों में
तो देर नहीं लगती
घावों की बखिया उधड़ने में --
यूँ ही चलती हैं कोशिशें
और-
जीती रहती हूँ मैं
एक सीली सी
पैबंद लगी जिंदगी ......!
Sunday, 28 October 2012
अभिलाषा
जब भी दिए की लौ सी जलती हूँ मैं
एक ही दुआ करती हूँ कि
तुम आओ -
चाहे तूफानी हवा बन कर
या फिर बारिश की बूँदें ,
चाहो तो सनसनाता दीर्घ श्वास ही .....
बुझा ही दोगे न मुझे ???
स्वीकार है मुझे यह
रंगीन आत्मघात -
क्यूंकि
इसी बहाने ही सही ...
कोई मुझे फिर जलाएगा
और तुम्हारा
मुझ तक ---
बार बार आना जाना
यूँ ही लगा रहेगा!!!!!
Wednesday, 24 October 2012
मैंने तुम्हें निष्काषित कर दिया है
अपने जीवन के उन तमाम पन्नों से
जहाँ इल्जामों की स्याही से लिख डाले थे तुमने
मेरे अजनबी होने के अहसास ......
अब भी वो अजनबियत घुली हुयी है
मेरी रूह, मेरी नसों में-
जो कभी कभी उभर आती है
शब्दों और हरकतों में भी-
अच्छा है नफरतों से मुलाकात
यूँ अचानक हो जाये
जो कुछ अन पिघला बाकी है हमारे दरमियाँ
भरभरा कर एक सैलाब तो ले आयेगा
यकीन की बेहिसाब कोशिशों में!!!!
Thursday, 18 October 2012
तमाम ख्वाब तैरा आई आज
झील की निस्तब्ध सतह पर
देखें रात भर कितनी हलचल
मचाती हैं लहरें .....
जल जाने दो उन में से कुछ को
सूरज के ताप में
बाकी बचे हवा की गिरफ्त में
बिखर ही जायेंगे ....
तुम तक तो एक भी न पहुँचने दूँगी
चाहे मछलियाँ भी उछल-कूद मचाएं .
मेरे ख्वाब हैं ,मेरी तहरीर है
तुमने तो लौटा ही दिए ना !
........
चलो देखें क्या क्या लौटाओगे ?
झील के किनारे के झुरमुट तो
अब भी फुसफुसाते हैं मेरा नाम
हमेशा तुम्हारे ही नाम के साथ ...
और वो पीले फूल-!
जिनमें छिपी सुबह का चेहरा
अब तक सुनहरा है
कांटे उगा ही नहीं पाते अपनी भुजाओं में
उस दिन के बाद से .....
बार बार पहाड़ी पर फिसलती तुम्हारी नज़र
पग डंडियाँ बना गयी है वहां
जिनसे गुज़र कर
कविताओं के छंद मुक्त नहीं होना चाहते ..
..........
चलो लौटा दो हवा में घुले वो तमाम स्पर्श
जिनके ताप से अब भी नमी ,
धुआं बन जाती है ....
मैं देती हूँ तुम्हें अपने
सारे शब्द ,नाम और तस्वीरें -
आखिर तुम्हें भी ज़रुरत पड़ेगी
उन स्मृतियों को झील की सतह पर
एक धुंध सा बिछा देने की
ताकि मेरे ख्वाबों में उलझ कर
कोई लहर तुम तक पहुंचा न दे
एक कतरा भी
उन लौटायी हुई तोहमतों का .......!!!!
Saturday, 22 September 2012
केंद्र नहीं हो तुम...
अटपटे सवालों के अनमने जवाब
और अटका देते हैं रोड़े
जीवन की सामानांतर राहों के
सीधेपन में ....
उतावलेपन की हदों को काटती
तमाम सही-गलत चापें
रिश्तों की मासूम गोलाइयों के
अर्थ ही बदल देती हैं ...
और
इतने कोनों से चुभोये जाते हैं
नुकीले नश्तर
कि त्रिभुज के तीन कोणों का
अस्तित्व ही निरर्थक हो जाता है...
उलाहनों के सघन अभ्यारण्य में
भटक जाते हैं खुद दिशा सूचक
और उत्तर दक्षिण का फर्क भूल
यहाँ वहां तकने लगता है
ध्रुव तारा...
धरती से आसमान तक
चारों दिशाओं की खींचतान में उलझी
ये आकारहीन जिंदगी
कभी आयात तो कभी वर्ग बनने की
जोड़ तोड़ से
क्यों कर उबर नहीं पाती ?
ज़रूरी तो नहीं कि
हर बार किसी केंद्र की तलाश
तुम ही पर ख़त्म हो???
Wednesday, 12 September 2012
अब तुम लौट जाओ
हाँ ,अब तुम लौट जाओ...
मेरे कोई भी शब्द ,अंक और रेखाएं
अब तुम्हें रोकने की कोशिश नहीं करेंगे
मेरी हथेलियों में तुम्हारे नाम की कोई रेखा
बनी ही नहीं ...
ना ही मेरे शब्दों को तुम्हारी धडकनों का
संगीत ही मिला है...
मुझे बंद कमरों की कैद हमेशा से भाती है
और तमाम सुबहों शामों से अपना नाम मिटा कर
उन्हें शहर से बाहर तक
हाथ पकड़ कर छोड़ने की फ़िक्र मुझे होने लगी है.....!
सन्नाटे मुझे कभी डरावने नहीं लगे
और चुप्पियों से मेरा पुराना नाता रहा है.
हाँ,अब तुम लौट जाओ
इससे पहले कि
मायूसी में तब्दील होने लगी मेरी आवाज़ की सिहरन ,
तुम्हें इन्सान महसूस करने में नाकामयाब हो जाये
तुम लौट जाओ.....!!!
लेकिन मेरे लौटने पर
ना कभी तुम्हारा वश था -ना रहेगा...
मेरे आंगन के गुलाब अब भी
तुम्हारे सवालों के सही जवाब देते हैं
वो तमाम स्मृतियाँ पहले ही
मेरी उम्र के हर कोने में घर कर चुकी हैं
जिन्हें उखाड़ फैंकने की तुम्हारी हर कोशिश
नाकाफी रही है .
मेरा लौटना तुम्हारी उम्मीदों से ज़रूर
वादाखिलाफी करेगा
क्यूंकि तुम्हें चोटों से जूझने का शौक है
तो मेरी आँखों की नमी भी
किसी गैर ज़रूरी मरहम को
बेअसर करने का दम रखती है.....
Friday, 10 August 2012
भूल जाना कितना अच्छा होता है
भूल जाना कितना अच्छा होता है
अगर वह गुनगुनी शाम में
तुम्हारे चेहरे पे टपकती परेशानी का एक कोना हो,
जिसके बाकी तीन हिस्से आंसुओं के सैलाब में
कश्ती की तरह हिचकोले ले रहे हों ..
भूल जाना सड़क के पार खुली खिड़की से झांकते
परछाई से सूखे फूलों का भी अच्छा होता है
जिसे ओस की बूंदों का इंतजार करना
अपनी महक बिखेरने से ज्यादा भाता है...
यकीन मानो ,
भूल जाना उन गुनगुनाते गीतों का भी अच्छा होता है
जिनके मायने वक़्त की सजा को कम करने की बजाय
हर घडी को उम्र कैद का दर्ज़ा देने में माहिर हो चुके हों
और जिनकी उम्मीद के तारों का संगीत
बेहद बेसुरा हो चुका हो....
कभी कभी सब कुछ भूल जाना भी अच्छा होता है
बशर्ते कि उसमें तुम्हारी यादों से जुडी
तमाम छोटी बड़ी हिस्सेदारियों का
वो एक कतरा भी ना हो
जिसे सहेज कर रखने में तुमने अपनी उम्र का
एक बड़ा हिस्सा यूँ ही गुज़ार दिया था ....
बस यूँ ही भूल जाना सचमुच अच्छा होता है
अगर वो मुमकिन तो हो....!
चलते-चलते
चलते-चलते जब तुम्हारी
पगडंडियों के पांवों में
छाले पड़ जाएँ -
तो उन्हें मेरी चौखट पे छोड़ जाना
मैं उन्हें धो पोंछ कर
अपनी ताक में रख दूँगी
कम से कमतर हो कर ,खो जाने वाले
पलों के बाद यकीनन तुम्हें
दोबारा मेरी तलाश होगी ही....
मैं अपनी पलकों को कस कर भींचना भी
तब बंद करुँगी
जब हवा में बहती नमी से तुम्हें
सिहरन होने लगेगी ...
जानते हो ,
उस दिन का अधूरा सफ़र
अपने बाकी होने पर इतना खुश क्यूँ है?
क्यूंकि उसे पता है कि
अधूरे सिरे को वहीँ से जोड़ना
तुम्हारी आदत नहीं है...
तुम फिर चल कर शुरुआत तक पहुंचोगे
और उलटे पाँव चलते तुम्हारे कदम
एक बार फिर थक कर
मेरी ही चौखट पे साँस खीचेंगे.
तुम्हारी तमाम कोशिशों के बावजूद
ये पग डंडियाँ मेरी ताक से निकाल कर
तुम्हारे तलवों के नीचे
तब तक नहीं बिछेंगी,
जब तक मेरी पलकों का गीलापन
तुम्हारे चेहरे की हर लकीर से मिल कर
एक नए किस्से को अंजाम ना दे दे......
Saturday, 4 August 2012
रोज़ इतने दर्द झड़ते हैं आसमान से
कि समूचा आँचल छटपटा कर
साँस तोड़ देता है....
कितनी तुरपनें उधड गयी हसरतों की
पर एक टांका भी फुर्सत का
लगा नहीं पाए तुम-
अब ये कतई ज़रूरी नहीं
कि तुम्हारे हर सवाल के ज़वाब में
मुस्कराहटों का समंदर उमड़े
या फिर
तुम्हारी हर कविता का आगाज़
मेरे आंसुओं की दस्तक से ही हो ...
ज़रूरी सिर्फ इतना भर है
कि तुम-तुम में ना रहो-
मेरे इर्द-गिर्द घिरी ख़ामोशी की नदी
अब भी दहाड़ें मारने को
बेक़रार है ,
बस तुम ख़ुशी की एक लहर
इस तरफ भी
बहाओ तो सही........!!!
मेरे आंसुओं की दस्तक से ही हो ...
ज़रूरी सिर्फ इतना भर है
कि तुम-तुम में ना रहो-
मेरे इर्द-गिर्द घिरी ख़ामोशी की नदी
अब भी दहाड़ें मारने को
बेक़रार है ,
बस तुम ख़ुशी की एक लहर
इस तरफ भी
बहाओ तो सही........!!!
Sunday, 8 July 2012
सारी संवेदनाओं को तिलांजलि दे
जब कविता काठ हो जाती है ,
तब भी बेहतर होती है वह
उन तमाम बेतरतीब खूंटों से
जो शब्द उगा पाने में नाकामयाब होकर
बस ,यूँ ही उठ खड़े होते हैं जहाँ तहां
चाह और आह की जुगाली करने --
यकीन मानो
कविता का मुस्कराना
कभी कभी उतना मायने नहीं रखता
जितना सन्नाटों को चुप्पा देने वाली
उसकी आखिरी सांसों का चढ़ना उतरना -
जिसमें घुली हुई धुंए और राख की गंध
अब भी इशारा करती है
कि सब कुछ तबाह होने और ना होने के बीच
सिर्फ तुम्हारे क़दमों का यूँ बेआवाज़
निशां छोड़ देना
उसे उसकी मंजिल की राहों का
एक नया पता देना भर है.....!
Sunday, 17 June 2012
पिता
जीवन के हर मुश्किल पल में
जब भी हाथ बढाया
तुम फ़ौरन चले आए...
पिता,तुम आसमान नहीं हो....!
पाल पोस कर बड़ा किया ,
उखाड़ा ,फिर रोप दिया
किसी और की बगिया में ...
पिता,तुम बरगद तो नहीं हो....!
चट्टान की मानिंद सख्त
पर उगने देते मखमली काई
अपने इर्द गिर्द की नमी में ...
पिता,तुम धूप भी नहीं हो ....!
महीने के आखिरी दिनों को छोड़
तमाम व्यस्तताएं भुला
लोरी झूले से नाता रखा ...
पिता, तुम सिर्फ रोटी नहीं हो....!
तुम्हारे कांपते हाथ ,अब भी मेरी उँगलियों में मौजूद हैं
तुम्हारा लहू ,मेरे पूरे वजूद में साँस लेता है
तुम्हारी ऑंखें ,मेरे पोर पोर से झांकती हैं
तुम्हारी सख्ती ,मेरे बच्चों के दुलार में दखल देती है
पिता,तुम आसमान ,बरगद,धूप और रोटी नहीं -
हर औलाद के जीवन सफ़र की
वह पगडण्डी हो -
जिस पर अंधाधुंध दौड़ कर भी
सब पा जाते हैं अपनी मंजिल
तुम्हारी ढेर सारी दुआओं की रौशनी की बदौलत .....!
Saturday, 16 June 2012
एक सोच
एक सोच-
कि तुम्हारा सब कुछ मेरा है-
अब नहीं रही...
गुज़र गई वह एक देह की तरह
मेरे जीवन की सीमाओं से परे ,
वक़्त की शाख से टूटते लम्हों की मानिंद
संवेदनाओं के आँचल की
फटी गांठ से टपकती
यहाँ -वहां ...
अब असंभव है उसे समेट कर
फिर से बांध लेना...
एक और सोच-
कि किसी को चाहो तो जिंदगी उसके नाम कर दो -
वह भी आज चल बसी ...
शोर मचाती रेल सी चाहत
अचानक खामोश पदचाप की तरह
मेरे बगल के दरवाजे पर
दस्तक देती रही ...
और मैं इंतजार करती रही
उसके मुड़ कर मेरे दरवाज़े तक आने का...
पर अब अपनी सोचों के देहावसान पर
दुखी नहीं होउंगी मैं -
अपना सा लगने लगा है मुझे
पीडाओं का चेहरा ...
और अच्छी लगती है अब
चोटों की मरहम से दुश्मनी ...
सुकून मिलने लगा है मुझे
उस कविता को लिख कर
जिसमें तुम्हारी मौजूदगी
अब कहीं नहीं है.....
Tuesday, 12 June 2012
सुनो,गौर से सुनो
उसके क़दमों की आहट
चूड़ियों की खनक
और पायल की रुनझुन -
समझो, उसकी कनखियों के इशारे
चुप चुप से संवादों
और माथे की सलवटों के मायने -
अब भी लरजते हैं उसके आलता रचे पाँव
याद करके तुम्हारी हथेलियों की छुअन
ज़मीन और उसके तलवों के दरमियाँ -
कभी छिपकर देखना
उसकी मेहंदी के बूटों में
कहीं होगा तुम्हारे ही नाम का पहला अक्षर-
यह भी दोहरा लेना
कि आखिरी बार कब लाकर दिया था
उसे फूलों का गजरा?
हो सकता है उसके तकिये में
अब भी समाई हो मोगरे की महक...
तमाम छोटी बड़ी उलझनों के बीच
कब तुमने इसरार किया था
एक प्याला चाय साथ साथ पीने का?
मुमकिन है वो राह तक रही हो
तुम्हारी फुर्सत के चंद लम्हों की ,
जो जाने अनजाने तुम उसे छोड़
कितनों के नाम कर आये.....
ज़रा फिर से पकड़ो दायरों के उस सिरे को
जिनमें चक्कर लगा लगा कर
तुम डगमगाते क़दमों की शुरुआत ही भूल गए...
आवाज़ देकर तो देखो आज फिर से -
न लौट आयें तमाम मुश्किलों के हल
थाम कर उसकी उँगलियों की गिरफ्त ,
तो समझूंगी मेरी सोच को अब
तुम्हारे सहारे की ज़रुरत है......
Monday, 11 June 2012
मैं तुम्हें कभी नहीं भूल सकती
आज फिर से उगी वही तमन्ना
एक बूँद बनूँ और बरसूँ तुम्हारे शहर में ...
मिन्नतें करुँगी सूरज से
इतना जलाये मुझे कि मैं बादल बन जाऊं ,
हवा से करुँगी गुज़ारिश
कि सीधे ला पटके मुझे
तुम्हारे शहर के आसमान में
और बस -
मैं बरस पडूँ वहां ......
कोई फ़िक्र नहीं
जो किसी नदी नाले में भटकती फिरूँ
हो सकता है पेड़ की फुनगी पे ही अटक जाऊं
या फिर नुक्कड़ वाले नल से ही टपक पडूँ ....
चाहत ये नहीं कि तुम्हारे शहर की मिटटी में
यूँ ही गुम हो जाना है मुझे ...!
ख्वाहिश तो यह जताने की है मेरी
कि मैं तुम्हें कभी नहीं भूल सकती......!!!
Sunday, 10 June 2012
स्थिरता ज़रूरी है
भावनाओं ,संबंधों और अपेक्षाओं में ...
उत्प्रेरक की तरह
हलचल मचने आती हैं दुविधाएं
संवेदनाओं के भंवर में
संदेह के कंकर उछलकूद मचाते हैं -
हथेली के नम होने से फिसल जाती है
आस्थाओं की लाठी और-
शिराओं में गहरे तक उतर जाते हैं
छिछोरे उलाहने .
एड़ी छोटी का जोर लगा देते हैं
दो टूक संवाद
हलों को उलझाने में .....
इन सबसे परे बसर करती है
एक नामुमकिन सी जिंदगी
बेसिर पैर के सवालों के जन्मने का
मकसद खोजती ,
परत दर परत उधेड़ती
ज़वाबों की तिलमिलाती बखिया -
और ना मिलने पर
अपनी फ़िक्र और चिंताओं का
सिर धुनती ....
मैं स्थिर रहूंगी
तुम्हारी तमाम बेवज़ह सी वजहों के बीच
अचल.अडिग ....दीवार सी ...
चाहे कठोरता के अनेकों कंटीले कटघरे
बनाने पड़ें मुझे अपने चारों ओर-
तुम्हारे बेशुमार बेमियादी तन् जों के खिलाफ.....!!!!
Sunday, 27 May 2012
तुम बार बार मेरे शब्दों से परे क्यूँ चले जाते हो?
हर बार नई कहानी गढ़ तुम्हे मनाया
अपनी सारी कवितायेँ तुम्हारे रास्ते बिछा दीं
तमाम बिम्बों की छाया कर राहत बिखेरी
फिर भी-
सोच की एक एक कतरन समेट बनाई
मेरी संवेदनाओं की पैरहन
कितनी बेरहमी से उधेड़ दी तुमने !
कभी सोचा कि अब भी मेरे आईने में
क्यूँ तुम्हारा ही अक्स आ खड़ा होता है?
मुस्कराहटों का मखौल उड़ाती पीडाएं
क्यूँ तुम्हारे चेहरे से फिसल
मेरे ही बर्दाश्त के आंगन में घर बनाती हैं?
सोचो!दूरियों से उपजे सारे फीके रंग
बेमकसद घूम फिर कर ,
मेरी ही आँखों में क्यूँ बस जाते हैं?
भला तुम कैसे दोगे इन सवालों के जवाब!!!
खामोश शहर के सन्नाटों को
तुम्हारे दो शब्दों का अरसे से इंतजार है ...
ना जाने हाथ छुड़ा कर जाने की तुम्हारी ये आदत कब जाएगी????
Saturday, 26 May 2012
उदासी आज फिर सिरहाने खड़ी है
उदासी आज फिर सिरहाने खड़ी है....
सवेरे बहुतेरी चिड़ियों को चुग्गा डाला
बगीचे का चक्कर भी लगा आयी
तमाम मुरझाये फूलों से मुस्कराहट बांटी
सूरज से ओट भी की हथेलियाँ फैला कर
मगर एक कोर भी न भीगी
मोगरे की बिसूरती कली की-
बस,यहीं से उदासी ने हाथ थाम लिया .....
उनींदी दोपहर को फटकार लगाई
तो अचकचाकर उठ खड़ी हुई बेचारी
दो लोटे पानी पिलाया कचरा टटोलते भीखू को
और उलझती लटों की परवाह किये बगैर
धूल भरी बदली को बरसने का वादा याद दिलाया
मगर झट से नकार कर चलती बनी वह
बेगैरत कहीं की......!
ज़रा सी राहत देना भी बर्दाश्त नहीं उसे
पेड़ों के तपते बदन को ...
रात से गुज़ारिश की ना बीतने की
तो उसने माथे पे शिकन डाल
चांदनी सूख जाने का बहाना बना डाला
बस यूँ ही-
तमाम कोशिशें करती रही
कि मन की आंच तुम तक ना पहुंचे
फिर भी ना जाने क्यूँ
उदासी आज सिरहाने खड़ी है .......!
Thursday, 17 May 2012
काश! तुम स्त्री होते
काश! तुम स्त्री होते
और समझते,
महसूस करते उस पीड़ा को
जो तुम हमें रोजाना देते हो, हर पल -
घरों ,चौराहों ,दफ्तरों और एकांत में.
तुम देखते
अपनी ही आँखों से लुटते हुए
अपना सर्वस्व
छोटी छोटी बातों पर.
तुम देखते मेरे समर्पण को
और तौलते अपने अहंकार को
मेरे विश्वास और अपने विश्वासघात के
तराजू पर.
तुम समझते रिश्तों के यथार्थ को
जिसे निभाते निभाते
मैं आखिरी साँस तक
भूल जाती हूँ अपना अस्तित्व ,
और देखने लगती हूँ
तुम्हारे अस्तित्व के दर्पण में
स्वयं को.
मगर तब मैं कहाँ होती हूँ???
जिधर देखती हूँ सिर्फ तुम ही तुम होते हो
मेरा अतीत,वर्तमान-भविष्य
और तुमसे लिपटा मेरा अनंत भी.
अच्छा अब मान भी जाओ
और एक पल को स्त्री बन कर देखो
नागों से लिपटे चन्दन की तरह....
अरे!तुम तो कल्पना भर से ही सिहर गए?
चलो जाने दो!
सत्य ,काल की सीमाओं से परे
मेरा स्त्री बने रहना ही
तुम्हारे पुरुष होने को
परिभाषित करता रहेगा....!
Saturday, 12 May 2012
कैसे लिख दूँ माँ पर कविता?
कैसे लिख दूँ माँ पर कविता?
यूँ ही जैसे लिखती हूँ
सूरज चाँद की रौशनी पर
या फिर समंदर की गहराई पर?
अक्सर लिखा है प्रेम के अदभुत रंगों पर
और नफरत की शिद्दतों पर भी -
अब कलम ही नहीं चलती
दूध के क़र्ज़ या आँचल की छाँव ,
लोरी की गुनगुनाहट या गोद की गर्माहट
जैसे लफ्जों पर!
कैसे लिख दूँ उन तमाम आशीर्वचनों पर
जिनके कवच सरीखे अहसास
कितना महफूज़ महसूस कराते हैं .
उन आंसुओं तले धुंधली होती नज़र को
कौनसे शब्दों का जामा पहनाऊं
जो वक़्त-बेवक्त की तकलीफों में
मेरे हिस्से का दर्द भी तुमसे साझा कर लेती हैं?
कैसे लिख दूँ माँ की कंपकपाती
हथेलियों की इबारत ,
जिनमें समाई कोमलता अक्सर
अब भी सिरहाने पसर जाती है
और रूह को ठंडक भरी तसल्ली दे जाती है ...
समय की सिरहन से गीला होता मन
न जाने क्यूँ उँगलियों का सहारा नहीं बन पाता
फिर भला कैसे संभव है
मेरे और माँ के बीच
सिर्फ एक कविता का सम्बन्ध?????
Sunday, 22 April 2012
जब भी उखाड़ फेंकते हो मुझे तुम
अपने जीवन की हरी भरी ज़मीन से
आस पास उगे खरपतवार की तरह -
मेरी संवेदनाओं की कंटीली झाड़ियाँ
तुनक कर और भी तीखी हो जाती हैं...
मिटटी का सारा कच्चापन ,सौंधापन
तड़कने लगता है ,
नुकीले शब्दों की जड़ों के बिंधने से -
बादलों के कहकहे भी
मुस्कराहटों के फूल खिला नहीं पाते
और जमती जाती है
अवसाद की परत दर परत
समूचे अस्तित्व के कोने कोने पर -
एक अदद ताज़ा हवा के इंतजार में
कितने ज़नम गुज़ारूँ मैं ???
कहीं कुछ नहीं बदला
सूरज के रोज़ सुबह पेड़ पर टंगने
और चाँद के दिन भर उबासी लेने के बीच
कहीं कुछ नहीं बदला है ...
शाम की स्याही भुनभुनाती सी बिखरती है ,
तारों को याद दिलाना पड़ता है खिलखिलाना ,
और हवा की मुस्कराहट, राह भटक भटक जाती है ...
दर्द की सिहरन भी वैसी ही है
पीड़ा सिर्फ मुख़्तार माई का नाम नहीं
हरी घास का अचानक चरमरा कर सूख जाना भी
दिल दुखा जाता है .
अब भी किसी के मन की तरलता
अपनी ओर बहती देख
हकीकत पानी पानी हो जाती है
और सपने ....वाष्पीकृत .
बदली तो रोज़ आने जाने से बनी
रिश्तों की पगडण्डी भी नहीं ,
क़दमों के सूखे निशानों से,
पपडीदार मुलम्मे-- अब भी चढ़ते हैं .
बहते पानी की कलकल
अब सिर्फ आँखों में सुनाई देती है
बाकी मुखौटे से चेहरे अक्सर
बोलों की खूँटी पर टंगे रहते हैं ....
फिर जब कहीं कुछ नहीं बदला
तो दर्द का पीलापन
कमरे में रखे गमले सा
हरा कैसे हो जायेगा?
मौन के दायरे
लकड़ी की सीढ़ी से टिके
दरख़्त की मानिंद कैसे झुक जायेंगे?
सुबह के सपने झूठ की चादर ओढ़
भला कब तक सोये रहेंगे?
और तब तक ---
मेरी कलम से तुम्हारे भावों का न बहना
लगभग असंभव होगा ,
वैसा ही ,जैसे तन्हाई और दर्द की
रोज़ रोज़ की मुलाकात का
अचकचाकर हाथ छुड़ा लेना ..........!!!
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