तमाम ख्वाब तैरा आई आज
झील की निस्तब्ध सतह पर
देखें रात भर कितनी हलचल
मचाती हैं लहरें .....
जल जाने दो उन में से कुछ को
सूरज के ताप में
बाकी बचे हवा की गिरफ्त में
बिखर ही जायेंगे ....
तुम तक तो एक भी न पहुँचने दूँगी
चाहे मछलियाँ भी उछल-कूद मचाएं .
मेरे ख्वाब हैं ,मेरी तहरीर है
तुमने तो लौटा ही दिए ना !
........
चलो देखें क्या क्या लौटाओगे ?
झील के किनारे के झुरमुट तो
अब भी फुसफुसाते हैं मेरा नाम
हमेशा तुम्हारे ही नाम के साथ ...
और वो पीले फूल-!
जिनमें छिपी सुबह का चेहरा
अब तक सुनहरा है
कांटे उगा ही नहीं पाते अपनी भुजाओं में
उस दिन के बाद से .....
बार बार पहाड़ी पर फिसलती तुम्हारी नज़र
पग डंडियाँ बना गयी है वहां
जिनसे गुज़र कर
कविताओं के छंद मुक्त नहीं होना चाहते ..
..........
चलो लौटा दो हवा में घुले वो तमाम स्पर्श
जिनके ताप से अब भी नमी ,
धुआं बन जाती है ....
मैं देती हूँ तुम्हें अपने
सारे शब्द ,नाम और तस्वीरें -
आखिर तुम्हें भी ज़रुरत पड़ेगी
उन स्मृतियों को झील की सतह पर
एक धुंध सा बिछा देने की
ताकि मेरे ख्वाबों में उलझ कर
कोई लहर तुम तक पहुंचा न दे
एक कतरा भी
उन लौटायी हुई तोहमतों का .......!!!!

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