Sunday, 28 October 2012

अभिलाषा


जब भी दिए की लौ सी जलती हूँ मैं
एक ही दुआ करती हूँ कि
तुम आओ -
 चाहे तूफानी हवा बन कर
या फिर बारिश की बूँदें ,
चाहो तो सनसनाता दीर्घ श्वास ही .....
बुझा ही दोगे न मुझे ???
स्वीकार है मुझे यह
रंगीन आत्मघात -
क्यूंकि
इसी बहाने ही सही ...
कोई मुझे फिर जलाएगा
और तुम्हारा
मुझ तक ---
बार बार आना जाना
यूँ ही लगा रहेगा!!!!!

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