मैंने तुम्हें निष्काषित कर दिया है
अपने जीवन के उन तमाम पन्नों से
जहाँ इल्जामों की स्याही से लिख डाले थे तुमने
मेरे अजनबी होने के अहसास ......
अब भी वो अजनबियत घुली हुयी है
मेरी रूह, मेरी नसों में-
जो कभी कभी उभर आती है
शब्दों और हरकतों में भी-
अच्छा है नफरतों से मुलाकात
यूँ अचानक हो जाये
जो कुछ अन पिघला बाकी है हमारे दरमियाँ
भरभरा कर एक सैलाब तो ले आयेगा
यकीन की बेहिसाब कोशिशों में!!!!

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