Tuesday, 12 January 2016

साँसों को सींचते रहने की कोशिशें भला कब  तक ???
मन की नमी सूखती जा रही है....
पलकें खुली किताब सी फ़ड़फ़ड़ातीं हैं
यूँ भला दर्द कैसे दरख़्त बन जियेंगे ?
आस के बादल दूर कहीं तलवों के नीचे दबा रखे हैं तुमने
एक उम्र चुटकी बजाते ही काट डाली थी
अब ये गुनाहों सी चादरें ओढ़ा कर
सलवटों से अनजान बनने की सजा तो न दो ... !
उस दौर तक दोबारा जाने का हौसला कहाँ
जिसमें शहर भर की सोच
मिटटी के घड़े सी पकाई थी
ये कह कर कि अब यहाँ बस्तियां नहीं उजड़ेंगी।
सुनो ,
छोड़ कर देखो नसीहतों की पतंग फिर से -
एक एक कर इल्ज़ाम
पेंच दर पेंच उलझ
हवा की बोलती बंद  देंगे
और तमाम रिश्तों की गिरह कसमसा कर
टूट जाने के भरम में ,
एक रंग भरे आसमान की ज़िद पूरी करने में
कामयाब हो जाएगी !!!!


Monday, 11 January 2016

समंदर किनारे लोग 
फँसाते मछलियाँ 
घोंपते खंजर 
अक्सर पीठ पर -
कभी तो वे समझेंगे 
इस्तेमाल सिर्फ वस्तुएँ होतीं हैं 
इंसान नहीं ... !!!

Monday, 4 January 2016

सुनो,
अबकी बार प्रेम में पड़ने से पहले
उन तमाम शहरों की धूल छान लेना
जहाँ डूबते सूरज को अर्क देने की प्रथा
सुहागिनों के चेहरों पर सौ -सौ चाँद उगा देती है।

हो सके तो उस दिशा में कुछ मंत्र  भी फूँक  देना
जहाँ यज्ञ के धुएँ को बारिश की बूँदों ने नहला दिया था
और आसमान हैरान हो कर
नारंगी से धूसर हो गया था।

इस बार अच्छी तरह परख लेना
चौराहे पे खड़ी मूर्तियों के चेहरों को ,
यकीनन उनकी पलकें बिना झपके
तुम्हारे ख्वाबों में तुम्हीं को बुनती हैं
फिर भी तुम राह भटक जाते हो।

प्रेम में होने की तुम्हारी अनगिनत शर्तें
गौ ग्रास की तरह, गंगा घाट पर प्रतीक्षारत
कागों को परोस देना -
देखना ,उस शाम की आरती में
सिर्फ उपालम्भों के दिये ही प्रवाहित होंगे।

और सुनो ...
ये सब ना हो सके तो
अबकी बार प्रेम में पड़ने से पहले
पिछले तमाम दिनों को रात में बदल कर
चाँद तारों को ओढ़ा देना
देखना -
अंधेरों से रौशनी का फर्क भूल गयी तुम्हारी आँखों से
मेरे नाम के सिवा कुछ और नहीं बरसेगा ....!!!


Saturday, 2 January 2016

मोहलत

मोहलत ही नहीं मिली इस बरस
तुम से जुड़ कर ,अलग होने -
और फिर से एक होने की।
एक आम सी ज़िंदगी की ख़ास पहचान
धुंध की शक़्ल में सितारों सी चमक
और पगडंडियों को समेटते रास्तों का सीधापन-
भूलता नहीं वो सब कुछ
जो याद आने से पहले तुम से हो कर गुज़रा
ख़ुदा की दी हुई
अमानत की तरह सहेजा
और धुआँ हुए ख्वाबों की महक सा समेटा।
आज भी -
बरस के आख़िरी  दिन
कुछ पाया नहीं तो कुछ खोने जैसा भी
महसूस नहीं होता
तड़के हुए शीशे सी ज़िंदगी को
एक और बरस की मोहलत दो....
फ़िक्र करने से पहले तुम्हारी
ख़ुद को तोडना
सीखना है !!!