मोहलत ही नहीं मिली इस बरस
तुम से जुड़ कर ,अलग होने -
और फिर से एक होने की।
एक आम सी ज़िंदगी की ख़ास पहचान
धुंध की शक़्ल में सितारों सी चमक
और पगडंडियों को समेटते रास्तों का सीधापन-
भूलता नहीं वो सब कुछ
जो याद आने से पहले तुम से हो कर गुज़रा
ख़ुदा की दी हुई
अमानत की तरह सहेजा
और धुआँ हुए ख्वाबों की महक सा समेटा।
आज भी -
बरस के आख़िरी दिन
कुछ पाया नहीं तो कुछ खोने जैसा भी
महसूस नहीं होता
तड़के हुए शीशे सी ज़िंदगी को
एक और बरस की मोहलत दो....
फ़िक्र करने से पहले तुम्हारी
ख़ुद को तोडना
सीखना है !!!
तुम से जुड़ कर ,अलग होने -
और फिर से एक होने की।
एक आम सी ज़िंदगी की ख़ास पहचान
धुंध की शक़्ल में सितारों सी चमक
और पगडंडियों को समेटते रास्तों का सीधापन-
भूलता नहीं वो सब कुछ
जो याद आने से पहले तुम से हो कर गुज़रा
ख़ुदा की दी हुई
अमानत की तरह सहेजा
और धुआँ हुए ख्वाबों की महक सा समेटा।
आज भी -
बरस के आख़िरी दिन
कुछ पाया नहीं तो कुछ खोने जैसा भी
महसूस नहीं होता
तड़के हुए शीशे सी ज़िंदगी को
एक और बरस की मोहलत दो....
फ़िक्र करने से पहले तुम्हारी
ख़ुद को तोडना
सीखना है !!!
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