Tuesday, 12 January 2016

साँसों को सींचते रहने की कोशिशें भला कब  तक ???
मन की नमी सूखती जा रही है....
पलकें खुली किताब सी फ़ड़फ़ड़ातीं हैं
यूँ भला दर्द कैसे दरख़्त बन जियेंगे ?
आस के बादल दूर कहीं तलवों के नीचे दबा रखे हैं तुमने
एक उम्र चुटकी बजाते ही काट डाली थी
अब ये गुनाहों सी चादरें ओढ़ा कर
सलवटों से अनजान बनने की सजा तो न दो ... !
उस दौर तक दोबारा जाने का हौसला कहाँ
जिसमें शहर भर की सोच
मिटटी के घड़े सी पकाई थी
ये कह कर कि अब यहाँ बस्तियां नहीं उजड़ेंगी।
सुनो ,
छोड़ कर देखो नसीहतों की पतंग फिर से -
एक एक कर इल्ज़ाम
पेंच दर पेंच उलझ
हवा की बोलती बंद  देंगे
और तमाम रिश्तों की गिरह कसमसा कर
टूट जाने के भरम में ,
एक रंग भरे आसमान की ज़िद पूरी करने में
कामयाब हो जाएगी !!!!


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