बेहतर होता हम अपने ईश्वर से
मुँह खोल के माँग लेते
पत्थरों को सेंक कर चमड़ी दागने की कला -
या फिर ,गोल किनारे वाले चौराहों पे झुके हुए
बुत-तराशों की पीठ पर अपनी उँगलियाँ घुमा कर पूछते
कि क्या आज धुंध छाई रही सूरज पर ?
उम्र के आखिरी पड़ाव की बाट जोहती
मछुआरिन की ऑंखें अब भी तरल हैं
रौशनी की दिशाओं से बेख़बर
मछलियों के अक़्स घूमा करते है उनमें ...
यूँ देखा जाये तो वक़्त की चक्की में
अँधेरा उजाला नहीं पिसता
धूप -छाँव के पाट भी नहीं होते वहाँ
सिर्फ धधकती साँसों के हुनर परखते
रिश्तों के तपाए जिस्म खड़े होते हैं
जिनके भीतर की आग में
मंद मंद ही सही
कुछ धूसर धुएँ-सा घुटता तो रहता है
लगातार ......!!!
मुँह खोल के माँग लेते
पत्थरों को सेंक कर चमड़ी दागने की कला -
या फिर ,गोल किनारे वाले चौराहों पे झुके हुए
बुत-तराशों की पीठ पर अपनी उँगलियाँ घुमा कर पूछते
कि क्या आज धुंध छाई रही सूरज पर ?
उम्र के आखिरी पड़ाव की बाट जोहती
मछुआरिन की ऑंखें अब भी तरल हैं
रौशनी की दिशाओं से बेख़बर
मछलियों के अक़्स घूमा करते है उनमें ...
यूँ देखा जाये तो वक़्त की चक्की में
अँधेरा उजाला नहीं पिसता
धूप -छाँव के पाट भी नहीं होते वहाँ
सिर्फ धधकती साँसों के हुनर परखते
रिश्तों के तपाए जिस्म खड़े होते हैं
जिनके भीतर की आग में
मंद मंद ही सही
कुछ धूसर धुएँ-सा घुटता तो रहता है
लगातार ......!!!
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